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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 100, Verse 5

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 100, verse 5 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 100 · श्लोक 5

संस्कृत श्लोक

बीजमेव न यस्यास्ति तत्कथं वद जायते । अप्रतर्क्यमनाख्यं च यत्तस्य क्वेव बीजता ॥ ५ ॥

हिन्दी अर्थ

उत्पन्न क्यो नहीं होता, इस पर कहते हैं। हे राजन्‌, भला आप बतलाइये तो सही, जिसका कोई बीज है ही नहीं, वह उत्पन्न कैसे होगा ? बीज के अभाव से वही बीज क्यो नहीं होगा, इस पर कहते हैं। हे राजन्‌, जो वस्तु अप्रत्य ओर अगम्य है, उसमें बीजता ही कहाँ ठहरेगी ?