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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 100, Verse 4

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 100, verse 4 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 100 · श्लोक 4

संस्कृत श्लोक

जायते कारणात्कार्यं यत्तत्कारणवद्भवेत् । यन्न जायत एवेह तस्मिन्सदृशता कुतः ॥ ४ ॥

हिन्दी अर्थ

अजन्मा होने से इसमें साद्श्यप्रसक्ति अवश्य होगी, यह कहते है । जो कार्य कारण से उत्पन्न होता है वह कारण के सदुश होता है । जो यहाँ उत्पन्न ही नहीं होता, उसमें भला सादृश्य आयेगा ही कहाँ से ?