Guru's AddaGuru's Adda

Upashama Prakarana (Dissolution) · Sarga 80

अठहत्तरवाँ सर्ग समाप्त उन्‍नासीवाँ सर्ग चित्त के विनाश के लिए जिन योग और ज्ञानरूपी दो उपायों का उपक्रम किया था, उनमें से पहले का पूर्व सर्ग में परिज्ञान हो जाने से द्वितीय का वर्णन ।

20 verse-groups

  1. Verse 1श्रीरामजी ने कहा : हे भगवान्‌, पूर्व सर्ग “दरौ क्रमौ चित्तनाशस्य“ इत्यादि से उपक्रान्त दो…
  2. Verse 2लक्षण, स्वरूप एवं साधन आदि से सम्यक्‌ ज्ञान का निरूपण करनेवाले महाराज श्रीवसिष्ठजी पहले आ…
  3. Verse 3इसी प्रकार जगत्‌ का बाध कर आत्मा का परिचय करना भी सम्यक्‌ ज्ञान का लक्षण है, ऐसा कहते हैं…
  4. Verse 4सम्यक्‌ ज्ञान में मोक्ष देने की सामर्थ्य है, ऐसा कहते हैं। श्रीरामजी, आत्मा का यथार्थ ज्ञ…
  5. Verse 5तब मुक्ति में क्या बच जाता है ? उसे बतलाते हैं। इस मुक्ति में संकल्पांशों से विनिर्मुक्त,…
  6. Verse 6हे श्रीरामजी, विद्वानों के द्वारा समस्त मलों से विनिर्मुक्त वह संवित्‌ जब विज्ञात हो जाती…
  7. Verse 7ऐसी स्थिति में ज्ञान और विषय में अविज्ञानजनित ही भेद है, ऐसा कहते है । हे श्रीरामजी, संवि…
  8. Verse 8सम्यक्‌ ज्ञान का निचोड स्वरूप कहते है । इस तीनों लोको में यथार्थ आत्मदर्शिता इतनी ही है क…
  9. Verse 9हे श्रीरामजी, यह सब आत्मस्वरूप ही हे, कोन भाव ओर अभाव अलग कर निरूपित हो सकते हैं ? वे कहा…
  10. Verse 10आत्मा से भिन्न न तो चेत्य है और न चित्त है, दृश्य रूप यह सब ब्रह्म ही शोभित हो रहा है, सम…
  11. Verse 11बड़े-से-बड़े पदार्थ हैं, उन सबसे भी बड़ा ब्रह्म है। माया से नट की नाईं अपनी आत्मा में ही…
  12. Verse 12जैसे काष्ठ, पाषाण और वस्त्रो के तात्त्विक स्वरूप का भलीभाँति परिज्ञान हो जाने पर उनमें तन…
  13. Verse 13हे राघव, आदि और अन्त में अविनाशी, पूर्णं शान्त जो स्वरूप है, वही प्रसिद्ध आत्मरूपत्व है,…
  14. Verse 14हे राघव, यह निखिल स्थावर ओर जंगमात्मकजगत्‌ निरतिशयानन्दात्मक चिदाकाशस्वरूप ही है, अतः सुख…
  15. Verse 15जैसे जल विचित्र तरगों से प्रस्फुरित होता है, वैसे ही द्वैत ओर अद्वैत विकल्पों से समुद्भूत…
  16. Verse 16जो महात्मा शुद्ध आत्मा का आलिगन कर अन्तःस्थ बुद्धि से सदा-सर्वदा अवस्थित रहता है, उस तत्त…
  17. Verse 17जैसे मन्द पवन पर्वत का भेदन नहीं कर सकते, वैसे ही जिस विद्वान्‌ ने प्रकाशमान आत्मा का पूर…
  18. Verse 18जैसे जल से निर्गत अथवा स्वल्प जल में स्थित मत्स्य को बगुले निगल जाते हैं, वैसे ही इस संसा…
  19. Verse 19हे श्रीरामजी, समस्त जगत्‌ आत्मस्वरूप ही है, कहीं पर भी अविद्या नाम की कोई वस्तु है नहीं,…
  20. Verses 20–49हे श्रीरामजी, जैसे अनेकविध सरोवरो मेँ जल, फेन आदि जल से पृथक्‌ नहीं हैं, वैसे ही (दृश्य ब…