Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 80, Verse 17
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 80, verse 17 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 80 · श्लोक 17
संस्कृत श्लोक
चित्त वल्गसि मिथ्यैव दृष्टोऽन्तो भवतो मया ।
आद्यन्तयोः सुतुच्छं त्वं वर्तमाने विनश्यसि ॥ १७ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे मन्द
पवन पर्वत का भेदन नहीं कर सकते, वैसे ही जिस विद्वान् ने प्रकाशमान आत्मा का पूर्णरूप से विचार
कर लिया हे, ऐसे तत्त्वज्ञ के अन्तःकरण को काम आदि छ: शत्रु तनिक भी भेदन नहीं कर सकते