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Upashama Prakarana (Dissolution) · Sarga 8

सातवाँ सर्ग समाप्त आठवाँ सर्ग वसन्त ऋतु में उपवन में विहार कर रहे श्रीजनकजी ने सिद्धों द्वारा गीत शुभ श्लोक सुने, यह वर्णन ।

12 verse-groups

  1. Verses 1–3महाबली उदारमति श्रीजनकजी विदेह देशों के शासक थे उनकी सब आपत्तियाँ निवृत्त हो चुकी थी ओर द…
  2. Verses 4–6किसी समय फूली हुई छोटी-छोटी लताओं से बढ़ी हुई वसन्त ऋतु में, जो मतवाले के समान बढ़ रही थी…
  3. Verses 7–8हे कमलनयन, तदनन्तर उन्होने किसी तमालवृक्ष की झाड़ी में छिपे हुए, सदा पर्वतो की गुफाओं मेँ…
  4. Verse 9सिद्धो ने कहा : चक्षु आदि इन्द्रियों द्वारा विषयों के प्रमाता का स्त्रकचन्दन, वनिता आदि व…
  5. Verse 10औरों ने कहा : द्रष्टा, दर्शन और दृश्य इस त्रिपुटी का वासना के साथ त्यागकर चक्षु, मानस आदि…
  6. Verse 11दर्शन के (मानस-वाश्चुषवृ्ति के) पहले उनकी उत्पत्ति का साक्षीरूप जो तत्त्व है, उसके विषय म…
  7. Verses 12–13औरों ने कहा : जिसमें यह सब है, जिसका यह सब है, जिससे यह सब है, जिसके लिए यह सब है, जिसके…
  8. Verse 14औरों ने कहा : हृदय गुहा में स्थित दैदीप्यमान ईश्वर का त्याग कर जो लोग अन्य के पास जाते है…
  9. Verse 15औरों ने कहा : सम्पूर्ण आशाओं का त्याग कर हृदय में स्थित ज्ञान का फलरूप यह ब्रह्म प्राप्त…
  10. Verse 16औरों ने कहा : जो दुर्बद्धि पुरुष भोग्य विषयों में अत्यन्त नीरसता को जानकर भी उनमें भोग तृ…
  11. Verse 17औरों ने कहा : जैसे इन्द्र वज से पर्वतां के ऊपर प्रहार करते हैं वैसे ही पुनः पुनः उठे हुए…
  12. Verse 18औरों ने कहा : पवित्र उपशम सुख को प्राप्त करे शमवान पुरुष का विशुद्ध चित्त शान्ति को प्राप…