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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 8, Verse 9

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 8, verse 9 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उपशम प्रकरण · सर्ग 8 · श्लोक 9

संस्कृत श्लोक

सिद्धा ऊचुः । द्रष्टृदृश्यसमायोगात्प्रत्ययानन्दनिश्चयः । यस्तं स्वमात्मतत्त्वोत्थं निःस्पन्दं समुपास्महे ॥ ९ ॥

हिन्दी अर्थ

सिद्धो ने कहा : चक्षु आदि इन्द्रियों द्वारा विषयों के प्रमाता का स्त्रकचन्दन, वनिता आदि विषय के साथ सम्बन्ध होने से उत्पन्न हुई विषयाकार बुद्धिवृत्ति में स्वयं प्रकाशमान जो आनन्दरूप निश्चय है, तद्रूप आत्मतत्त्व के परिशोधन द्वारा निरतिशय भूमारूप से आविर्भूत आत्मा का, निर्विकल्प समाधि द्वारा बाहरी और अन्तःकरण के स्पन्द का त्याग कर, हम निरन्तर (अनुभव) करते हैं । भाव यह कि विषयाकारवृत्ति में स्वयं प्रकाशमान आनन्द विषय कोटि में नहीं आ सकता, क्योकि उसे विषय मानो तो वह जड हो जायेगा । कर्ता, करण ओर वृत्तिकोटि में भी नहीं आ सकता, क्योकि वे कारक हे । आनन्दरूप, साध्य का तदवयव (साधन का अंग) होना अनुभव विरुद्ध है इसलिए वह साक्षिकोटि में ही आता हे । साक्षी ही अविद्यारूपी आवरण से मन्द चिदानन्द स्वभाववाला होकर अन्य अहंकारात्मा की कल्पना कर मानों उसकी अंगता को प्राप्त हुआ-सा निरतिशय आनन्दरूप अपने आत्मा को नहीं जानता है; अतएव उसी स्वतत्त्व के विचार से आविर्भूत निरतिशयानन्दस्वभाव की समाधिस्थ मन से हम उपासना करते हैँ । "एतस्यैवानन्दस्यान्यानि भूतानि मात्रामुपजीवन्ति" (इसी आनन्द की मात्रा का एक अंश का अन्य प्राणी उपजीवन करते हैं) इस श्रुति से ब्रह्मानन्द की ही अविद्या द्वारा विषयाकारवृत्ति के परिच्छेद से विषयानन्दत्व प्रतीति होती है