Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 8, Verses 4–6
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 8, verses 4–6 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 8 · श्लोक 4-6
संस्कृत श्लोक
प्रफुल्लवाललतिके मञ्जरीपुञ्जपिञ्जरे ।
स कदाचिन्मधौ मत्ते कोकिलालापलासिनि ॥ ४ ॥
ययौ कुसुमिताभोगंसुविलासलताङ्गनम् ।
लीलयोपवनं कान्तं नन्दनं वासवो यथा ॥ ५ ॥
तस्मिन्वरवने हृद्ये केसरोद्दाममारुते ।
दूरस्थानुचरः सानुकुञ्जेषु विचचार ह ॥ ६ ॥
हिन्दी अर्थ
किसी समय फूली हुई छोटी-छोटी लताओं से
बढ़ी हुई वसन्त ऋतु में, जो मतवाले के समान बढ़ रही थी, कोकिलो के गानों से मानों नाच रही
थी ओर मंजरियों की राशियों से पीली थी, महाराज जनक जैसे देवराज इन्द्र सुन्दर नन्दनवन में
जाते हैं वैसे ही, जिसका सारा भाग प्रफुल्लित था, सुन्दर विलासवाली लताओं ओर महिलाओं से
भरा था उस सुन्दर उपवन में लीला से गये । उस मनोरम श्रेष्ठ उपवन में, जिसमें केसरो में स्थित
पराग, सुगन्धि ओर मकरन्द के कणों को हरने में : न कि धूलि उड़ाने आदि में समर्थ उद्दाम यानी
मन्द, सुगन्ध और शीतल वायु बह रहे थे, अनुचरो को दूर रखकर उन्होने क्रीडाशेल के शिखरो पर
उगे हुए लतागृह मे विचरण किया