Guru's AddaGuru's Adda

Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 8, Verse 11

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 8, verse 11 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उपशम प्रकरण · सर्ग 8 · श्लोक 11

संस्कृत श्लोक

अन्ये ऊचुः । द्वयोर्मध्यगतं नित्यमस्तिनास्तीति पक्षयोः । प्रकाशनं प्रकाश्यानामात्मानं समुपास्महे ॥ ११ ॥

हिन्दी अर्थ

दर्शन के (मानस-वाश्चुषवृ्ति के) पहले उनकी उत्पत्ति का साक्षीरूप जो तत्त्व है, उसके विषय में जो लोग अस्ति, नास्ति इस प्रकार का संदेह करते हैं, उनके प्रति भी दोनों (अस्ति-नास्ति) पक्षों के अविरुद्ध साक्षी को दशति हुए दूसरे सिद्ध लोग कहते हैं। जो लोग-मानस, चाक्षुष आदि वृत्तियों के पहले से ही सिद्ध उनकी उत्पत्ति का साक्षीभूत तत्त्व है, परन्तु वह भी जन्य ही है, नित्य नहीं है- ऐसा कहते हैं, उनके पक्ष में पूर्व-पूर्व के आभासों के स्वप्रकाशता अथवा स्वविषयता दोनों पक्षों में स्वमात्र के भान में परिक्षीण होने से वे पूर्वोत्तर विज्ञानों का स्पर्श नहीं कर सकते । इसलिए उनमें उनकी (पूर्वोत्तर विज्ञान की) उत्पत्ति आदि की साक्षिता नहीं हो सकती । स्वयं अपनी उत्पत्ति आदि का साक्षी तो हो नहीं सकता, क्‍योंकि अपनी उत्पत्ति के पहले वह स्वयं असिद्ध है, इसलिए कोई दूसरा ही साक्षी आवश्यक है, अतएव अस्ति पक्ष के मध्यगत और अविरुद्ध एवं जो लोग साक्षी नहीं है, ऐसा कहते हैं उनकी नास्तिकता भी साक्षीरहित होने के कारण असिद्ध ही है, अतएव उस पक्ष का साधक होने से उस पक्ष के मध्यगत और उसके अविरुद्ध तथा प्रकाश्यों का प्रकाशक जो नित्य आत्मा है, उसकी हम उपासना करते हैं