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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 8, Verses 12–13

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 8, verses 12–13 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उपशम प्रकरण · सर्ग 8 · श्लोक 12,13

संस्कृत श्लोक

अन्ये ऊचुः । यस्मिन्सर्वं यस्य सर्वं यतः सर्वं यस्मायिदम् । येन सर्वं यद्धि सर्वं तत्सत्यं समुपास्महे ॥ १२ ॥ अन्ये ऊचुः । अशिरस्कं हकारान्तमशेषाकारसंस्थितम् । अजस्रमुच्चरन्तं स्वं तमात्मानमुपास्महे ॥ १३ ॥

हिन्दी अर्थ

औरों ने कहा : जिसमें यह सब है, जिसका यह सब है, जिससे यह सब है, जिसके लिए यह सब है, जिसके द्वारा यह सब है। जो यह सब है उस सत्य की हम उपासना करते हैं। औरों ने कहा: 'अ'सिर के समान जिसका प्रथम वर्ण है और 'ह'जिसके अन्त में है यानी अकारादि- हकारान्त समस्त वस्तुओं के प्रकाशक वेद-शास्त्र आदि शब्दसमूह के प्रकृतिभूत मस्तर्व का अक्षरसमाम्नाय में (आकारादि हकारान्त समुदाय में) निवेश होने से सम्पूर्णं जगत के आकारवाले सप्रपंच ब्रह्म मे अनुगत, “अह्योतिव्याप्नोति' इस व्युत्पत्ति द्वारा अशेषाकार यानी आकाररहित निर्गुण ब्रह्म में भी स्थित तथा निरन्तर क्रियमाण स्वव्यवहारों मेँ उच्चार्यमाण अहंपद के वाच्य स्वात्मभूत ब्रह्मात्मा की हम लोग निरन्तर भावना करते हें