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Upashama Prakarana (Dissolution) · Sarga 76

55 verse-groups

  1. Verse 1चौहत्तरवाँ सर्गे समाप्त पचहत्तरवाँ सर्ग बड़े-बड़े अधिकारों में भी हर्ष, शोक आदि के साथ सम…
  2. Verse 2आपके पितामह महाराज दिलीप ने अनेक तरह के उचित सांसारिक कर्मो में सर्वदानिरत होने पर भी भीत…
  3. Verse 3राग आदि की कालिमा से शून्य होने के कारण आत्मज्ञान को प्राप्त हुए महाराज मनु ने चिरकाल तक…
  4. Verse 4विचित्र सैन्य तथा बाहुबल का जिनमें उपयोग होता था, एसे युद्धं मे तथा अनेक व्यवहारो मे दीर्…
  5. Verse 5पाताल की पीठ पर आसीन होकर बलिराज यथार्थ-से व्यापार को करते हुए भी सदा त्यागी, सदा अनासक्त…
  6. Verse 6“दिवस स्थितिम्‌" ऐसा यदि पाठ हो, तो पाताल में निवास करने के लिए भगवान्‌ के द्वारा नियमित…
  7. Verse 7इन्द्र के युद्ध में अपने शरीर का परित्याग करनेवाले मानी वृत्रासुर ने, जिसका अन्तःकरण अत्य…
  8. Verse 8पाताल तल का परिपालन करनेवाले दानवोचित कर्मो का अनुष्ठान कर रहे भक्त प्रवर प्रह्लाद अविनाश…
  9. Verse 9हे श्रीरामजी, यद्यपि केवल माया में ही निरत रहता था तथापि हृदयस्थ चिदाकाश एकरूपता से आविर्…
  10. Verse 10दानवाँ की कार्य सिद्धि के लिए भगवान्‌ नारायण के साथ युद्ध कर रहे कुशल शम्बरासुर ने अथवा क…
  11. Verse 11समस्त देवताओं का मुखस्वरूप अग्नि क्रिया समूह में तत्पर होता हुआ भी यज्ञीय लक्ष्मी का चिरक…
  12. Verse 12जैसे पैरों से आक्रमण करने पर आकाश सम्बन्ध को प्राप्त नहीं होता, वैसे ही समस्त देवताओं के…
  13. Verse 13पत्नी के लिए चन्द्रमा के साथ जिन्होंने युद्ध किया था, ऐसे देवताओं के गुरु बृहस्पति स्वर्ग…
  14. Verse 14आकाशतल में चमकनेवाले, विद्वान तथा नीतिशास्त्र रचना के द्वारा समस्त अभिमत अर्थो का परिपालन…
  15. Verse 15ऊपर के लोकों का और प्राणिसमूहों के अंगों का चिरकाल से संचरण करा रहा वायु भी मुक्त ही स्थि…
  16. Verse 16हे श्रीरामजी, नैकविधप्राणियोके समूह के अत्यन्त वेगवूर्वक ऊपर, नीचे ओर मध्यलोक की गतियो से…
  17. Verse 17भगवन्‌ श्रीहरि यद्यपि नित्यमुक्त हैँ तथापि जरा, मरण, युद्ध आदि द्वन्दो की युद्धलीला से इस…
  18. Verse 18जैसे कोई कामुक कामिनी को धारण करे, वैसे ही नित्यमुक्त, भगवान्‌ त्रिनेत्र शंकरजी सौन्दर्य…
  19. Verse 19मुक्त होते हुए भगवती गौरी ने भी त्रिनेत्र धूर्जटि को चन्द्रमा की कला की नाई अति स्वच्छ अत…
  20. Verse 20जिसकी विचित्र दुरवगाह बुद्धि थी यानी साधारण बुद्धिवाले लोग जिन पदार्थों को समझ नहीं सकते…
  21. Verse 21हे श्रीरामजी, ध्यानरूपी सलिल से धोई गई, धीर मुक्त बुद्धि से ही भृगीश ने (शिवजी के गणविशेष…
  22. Verse 22महामुनि नारदजी यद्यपि मुक्त स्वभाव हैं, तथापि इस जगत्रूपी जंगल के खण्ड में कलह कौतुक को प…
  23. Verse 23भद्र श्रीरामजी, समस्त भुवनों में अत्यन्त मान्य, समर्थ यह विश्वामित्र महर्षि यद्यपि जीवन्म…
  24. Verse 24जीवन्मुक्त होकर ही सहस्रमुख, नागराज शेष पृथ्वी को धारण करते हैं, सूर्य भगवान्‌ दिवसों की…
  25. Verse 25इस पूर्वोक्त महानुभावो के सिवा दूसरे भी सैकड़ों महात्मा, राक्षस, मनुष्य ओर देवता इस त्रिभ…
  26. Verse 26विचित्र शोक, मोह अनर्थो के उत्पादक तथा पुत्र, स्त्री, धन-सम्पत्तिआदि का संग्रहकर युद्ध, व…
  27. Verse 27कुछ महानुभावं ने उत्कृष्ट आत्मज्ञान का सम्पादन कर चित्तविक्षेप की निवृत्ति के लिए तपोवन क…
  28. Verse 28कुछ तत्त्वज्ञ महात्मा आत्मज्ञान प्राप्तकर राज्यकर्म में ही छत्र, चामर आदि से रक्षित होकर…
  29. Verse 29कुछ तत्त्वज्ञ आकाश में ग्रह, नक्षत्र आदि के आधारभूत ज्योतिश्चक्र के मध्य में अवस्थित हे ।…
  30. Verses 30–31कुछ तो देवताओं के पद को प्राप्त होकर विमानों की पंक्तियों के ऊपर आरूढ होकर स्थित हैं | जै…
  31. Verse 32कुछ महानुभाव पाताल की कन्दरा मेँ जीवन्मुक्त होकर सुस्थित हैँ । जैसे बलि, सुहोत्र, अन्ध, प…
  32. Verse 33यदि शंका हो कि जितने सात्विक है उन सबमें देवता अधिक सात्विक है, अतः जिनकी ज्ञान ओर एश्वर्…
  33. Verse 34पूर्वोक्त अर्थ को ही स्पष्टरूप से कहते हैं। विधि की नियति, अनन्त कार्यो के आरम्भ में निरत…
  34. Verse 35विधि कौन है ? इसे कहते हैं। ब्रह्मा, दैव, विष्णु, हिरण्यगर्भ, शिव, ईश्वर आदि परमात्मा के…
  35. Verse 36जहाँ पर अत्यन्त असंभावित भी वस्तु और अवस्तु दोनों एक दूसरे के भीतर संभावित हो जाती हैं, व…
  36. Verse 37हे श्रीरामजी, जो युक्त नहीं है उसमें युक्ति से विमर्श करने पर युक्तता दिखाई पड़ती है, क्य…
  37. Verse 38हे साधो, असत्य मेँ भी फलतः शाश्वती सत्यता दिखाई पडती है, क्योंकि शून्यात्मक ध्यान-योग से…
  38. Verse 39असलियत में जो नहीं है, उसका भी देश और काल के विलास से शीघ्र प्रादुर्भाव हो जाता है, जैसे…
  39. Verse 40जिनका विनाश कभी भी संभावित नहीं था, ऐसे सुदृढ़ पदार्थ भी कल्प के अन्त में क्षय को प्राप्त…
  40. Verse 41असंभावित का भी संभव है, इसका प्रासंगिक जो उपादान हुआ, उसका भी प्रकृत ही फल है, यह दिखलाते…
  41. Verse 42इस संसार मेँ जो असत्‌ हे, वह सत्‌ भी प्रतीत होता हे ओर जो सत्‌ है, वह असत्‌-रूप भी प्रतीत…
  42. Verse 43यदि शंका हो कि ऐसा होने पर विदेह मुक्ति में भी फिर संसार प्राप्ति की संभावना हो जायेगी, त…
  43. Verse 44मुक्ति नित्य-प्राप्त आत्मस्वरूप है, इससे भी उसके विनाश की आशंका नहीं हो सकती । विस्मृत गल…
  44. Verse 45हे श्रीरामजी, विवेक ओर अविवेक से मुक्ति सुलभ ओर असुलभ हो जाती है, इसलिए आप मनोविनाश को प्…
  45. Verse 46हे श्रीरामजी, जिसको मुक्ति की अभिलाषा हो, उसे आत्मा के अवलोकन में यत्न करना चाहिए। समस्त…
  46. Verse 47यदि शंका हो कि पहले के महात्माओं की जीवन्मुक्ति का संभव होने पर भी वर्तमान काल के महात्मा…
  47. Verse 48हे श्रीरामचन्द्रजी, इसलिए आप भी वैराग्य और विवेक से उदित धीरबुद्धि से समन्वित मि ट्टी के…
  48. Verse 49हे राघव, इस लोक में देहधारी जीवों की दो प्रकार की मुक्ति है एक तो सदेह-मुक्ति और दूसरी वि…
  49. Verse 50उसमें पहले सदेहमुक्ति और विदेह मुक्ति इन दोनों मुक्तियों में घटनेवाले मुक्ति शब्द के अर्थ…
  50. Verse 51भद्र उसमें स्नेह बन्धन का विनाश ही यानी देहादि में आत्मस्वरूपत्व के विभ्रम से हुई प्रीति…
  51. Verse 52जो विद्वान्‌ विषय-स्नेह से रहित होकर जीता है, वह जीवन्मुक्त कहलाता है, जो विषय स्नेह से स…
  52. Verse 53भद्र, मोक्ष के लिए शम, दम आदि चार साधनों के मध्य में यत्न के द्वारा पूर्वपूर्व की सिद्धि…
  53. Verse 54तथोक्त युक्तिपूर्वक प्रयत्न का अनुष्ठान वहाँ तक करना चाहिए, जहाँ तक कि आत्मा के स्वरूप का…
  54. Verse 55कथित अर्थ को ही स्पष्टरूप से कहते हैं। हे रामजी, बड़े धैर्य का अवलम्बन कर फल की प्राप्ति…
  55. Verse 56सुगम यानी बुद्ध और प्रकृति पुरुष भिन्नत्वरूप शोभन विवेक को प्राप्त हुए महामुनि कपिल इन दो…