Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 76, Verse 1
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 76, verse 1 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 76 · श्लोक 1
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
ब्रह्मणः समुपायान्ति जगन्तीमानि राघव ।
स्थैर्यं यान्त्यविवेकेन शाम्यन्त्येव विवेकतः ॥ १ ॥
हिन्दी अर्थ
चौहत्तरवाँ सर्गे समाप्त
पचहत्तरवाँ सर्ग
बड़े-बड़े अधिकारों में भी हर्ष, शोक आदि के साथ सम्बन्ध रखनेवाले अनेक
मुक्त देवता, असुर, मनुष्य आदि का वर्णन ।
महाराज वसिष्ठजी ने कहा : हे राघव, अपने राज्य मेँ समयोचित तत्-तत् व्यवहार में तत्पर होते
हुए भी राजा जनक निखिल मानसिक चिन्तारूपी ज्वर से रहित तथा भीतर आकुल मति से वर्जित
होकर ही सदा-सर्वदा अवस्थित हुए