Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 76, Verse 2
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 76, verse 2 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 76 · श्लोक 2
संस्कृत श्लोक
जगज्जालजलावर्तवृत्तयो ब्रह्मवारिधौ ।
संख्यातुं केन शक्यन्ते भासां च त्रसरेणवः ॥ २ ॥
हिन्दी अर्थ
आपके पितामह महाराज दिलीप ने अनेक तरह के उचित
सांसारिक कर्मो में सर्वदानिरत होने पर भी भीतर आसक्ति से वर्जित होकर ही दीर्घकाल तक पृथ्वी का
उपभोग किया