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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 76, Verse 18

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 76, verse 18 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उपशम प्रकरण · सर्ग 76 · श्लोक 18

संस्कृत श्लोक

पूर्वं धिया विचार्यैते भोगा भोगिभयप्रदाः । भोक्तव्याश्चरमं राम गरुडेनेव पन्नगाः ॥ १८ ॥

हिन्दी अर्थ

जैसे कोई कामुक कामिनी को धारण करे, वैसे ही नित्यमुक्त, भगवान्‌ त्रिनेत्र शंकरजी सौन्दर्य तरु की मंजरीरूपा भगवती गौरी को अपने देहार्धं मे परिधारण करते हँ । भगवान्‌ त्रिनेत्र न तो कामुक हैं और न भगवती गौरी कामिनी ही हैं, किन्तु एक ब्रह्म और दूसरी ब्रह्मविद्या है, यह ध्वनित किया है