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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 76, Verse 56

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 76, verse 56 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उपशम प्रकरण · सर्ग 76 · श्लोक 56

इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।

हिन्दी अर्थ

सुगम यानी बुद्ध और प्रकृति पुरुष भिन्नत्वरूप शोभन विवेक को प्राप्त हुए महामुनि कपिल इन दोनों ने खूब विचार करके भी अध्यवसाय करने की समार्थ्य न होने के कारण आत्मतत्त्व से विच्युत होकर क्षणिक विज्ञानों के सन्तानरूप ओर सत्त्वादि गुणत्रय की साम्यअवस्थारूप प्रधानपद को प्राप्त किया, एवं किसी यानी वेद का निन्दक होने के कारण जिसका नाम लेना समुचित नहीं है ऐसे अर्हद नाम के क्षत्रिय राजा ने भी असली ब्रह्मतत्त्व से विच्युत होकर आत्मा को चित्स्वभाव मानकर भी देह के तुल्य परिमाणवाला मानने से हाथी, मच्छर आदियों के शरीरो में प्रवेश करने में अवयवों का उपचय प्राप्त होने के कारण अध्रुव ही माना है, इसलिए ये तीनों अनुत्तम मिथ्यापद में ही निमग्न हैँ ओर जो वेद के रहस्य में निष्णात हैं, ऐसे महानुभावं ने तो उत्तम सत्यादिस्वरूप परमपद को यथार्थरूप से प्राप्त किया है, वह वेदोक्तमार्ग से प्राप्त किया गया पद प्रयत्न लक्षण कल्पतरू का महान्‌ फल है, इसलिए उसी प्रकार दूसरे भी प्रयत्न करे