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Upashama Prakarana (Dissolution) · Sarga 69

सड़सठवाँ सर्ग समाप्त अड़सठवाँ सर्ग॑ संसक्ति ओर असंसक्त के लक्षण, वन्द्या-अवन्ध्याविभाग तथा फल का वर्णन ।

52 verse-groups

  1. Verse 1श्रीरामजी ने कहा : भगवान्‌, संग किस प्रकार से होता है किस तरह का संग मनुष्यों को बन्धन मे…
  2. Verse 2वसिष्ठजी ने कहा : भद्र, शरीर (क्षेत्र) ओर शरीरी (क्षेत्रज्ञ) आत्मा का जो विभाग है यानी शर…
  3. Verse 3संग के अन्यान्य लक्षण कहते हैं। आत्मा का स्वरूप असीम है यानी उसका काल से, देश और वस्तु से…
  4. Verse 4बन्धन हेतु आसक्ति की विरोधिनी असंग स्थिति का लक्षण कहते हैं। श्रीरामजी, यह दिखाई दे रहा स…
  5. Verse 5मैं अहंकार से परिच्छिन्न (स्वल्पता को प्राप्त) नहीं हूँ, मेरे सिवा दूसरा कोई नहीं है, इसल…
  6. Verse 6हे श्रीरामजी, जो अपने सर्वकर्मत्याग की यत्र तत्र बडाई नहीं करता, जो फल के उद्देश्य से कर्…
  7. Verse 7सदा सर्वदा केवल आत्मस्वरूप में निष्ठा रखनेवाले जिस महात्मा का अन्तःकरण हर्ष और क्रोध के व…
  8. Verse 8जो पुरुष, अत्यन्त कुशलतापूर्वक सम्पूर्ण कर्म और तज्जनित फल आदि केवल मन से ही, न कि कर्म स…
  9. Verse 9तीन प्रश्नों का समाधान कर चतुर्थ प्रश्न का समाधान करते हैं। हे राघव, संसक्ति के अभाव से अ…
  10. Verse 10अब आसक्ति से होनेवाले परिणामों का विस्तारपूर्वक निरूपण करते है । भद्र, आसक्ति से विस्तार…
  11. Verse 11जिसका नाक नाथ से खींचा गया हो, ऐसा गदहा भयभीतात्मा होकर जो अपनी गति से मार्ग में भार ढोता…
  12. Verse 12वृक्ष एक स्थान में चुपचाप खड़ा होकर अपने स्थावर शरीर से ठंड, वायु और धूप के क्लेशको जो सह…
  13. Verse 13भूमि के बिल में पड़ा हुआ अतएव अपने अंगों मे पीडा का अनुभव कर रहा बेचैन कीट जो काल काट रहा…
  14. Verse 14क्षुधा से जिसकी पाँख कृश हो गई है तथा जिसकी बुद्धि बाण, पत्थर, मिट्टी के ढेले आदि के अभिघ…
  15. Verse 15दूब, कोपलों ओर तिनको का आहार करनेवाला मृग भीलों के बाणों की पीडा से अपनी देह को जो छोड दे…
  16. Verse 16पुण्य ओर पाप के अधिकारी ये जन-समूह ध्वस्त -विध्वस्त होकर बार बार जन्म धारण कर रहे कृमि ओर…
  17. Verse 17जलाशय में तरगों की नाई ये असंख्य भूत (प्राणी) उत्पन्न हो होकर जो विलीन हो जाते हैं, वह भी…
  18. Verse 18लता ओर तिनको के समान शक्तिहीन दशा को प्राप्त अतएव चलने-फिरने की शक्ति से शून्य मनुष्य पुन…
  19. Verse 19भूमि के अन्दर स्थित जल को अपने अपने मूलो से पीकर तृण, गुल्म, लता आदि अपने अपने विजातीय स्…
  20. Verse 20अपनी अनर्थ परम्पराओं के अनुरूप वियोग, भ्रान्ति, पतन आदि हजारों विक्षेपो के हेतु असंख्य बा…
  21. Verse 21हे श्रीरामजी, आसक्ति दो प्रकार की कही गई है एक वन्द्या (वंदनीय) यानी प्रशस्त ओर दूसरी वन्…
  22. Verse 22आत्मतत्त्वज्ञान से रहित, देह आदि असत्य वस्तुओं से जनित जो अत्यन्त दृढ़ यानी चिरकाल से भाव…
  23. Verse 23आत्मा के स्वरूपज्ञानरूप हेतु के द्वारा यथार्थ ओर अयथार्थ वस्तु के (नित्यानित्यवस्तु के) व…
  24. Verse 24सर्वोत्कर्षत्व की सम्पादक यही वन्द्या आसक्ति है, ऐसा कहते है। श्रीरामजी, जिनके हाथों मे श…
  25. Verse 25इरी वन्द्या संसक्ति की सामर्थ्य से भगवान्‌ सूर्यनारायण आकाशमार्ग मे किसी प्रकार का अवलम्ब…
  26. Verse 26हे राघव, जिसने प्राकृत प्रलय में विदेह-कैवल्यरूप परम शान्ति के लिए दो परार्ध वर्ष पर्यन्त…
  27. Verse 27केवल लीला से गौरीरूपी आलान (बन्धन- स्तम्भ) मेँ आसक्त तथा भस्म से अत्यन्त सुशोभित महादेवजी…
  28. Verse 28जिन्होंने आत्मतत्त्व के विज्ञान में दृढ़ प्रतिष्ठा पाई है, ऐसे सिद्ध, लोकपाल तथा अन्यान्य…
  29. Verse 29तीन लोकों से भिन्न अन्यान्य भुवन (महः, जनः, तपः आदि लोकों मेँ रहनेवाले तत्त्वज्ञ महात्मा…
  30. Verse 30वन्ध्या संसक्ति मेँ वन्ध्यात्व (निष्फलत्व) ही है, इसका उपपादन करते हैं। माँस के टुकड़ों म…
  31. Verse 31मुक्त और अमुक्त दोनों के सारे व्यवहार संसक्ति से ही होते हैं, यों विस्तारपूर्वक बतलाते है…
  32. Verse 32संसक्ति के प्रभाव से ब्रह्माण्डरूपी गूलर के फल में मच्छरों की नाई अपना अपना व्यवहार कर रह…
  33. Verse 33हे रामजी, समुद्र में तरंगों की नाई ये असंख्य भूत जो उत्पन्न होते हैं, मरते हैं, गिरते हैं…
  34. Verse 34झरनों के जलकणों के समान उड़-उड़ कर विरसतापूर्वक ये भूत जो विलीन हो जाते हैं, वह भी संसक्त…
  35. Verse 35मछली के सदृश एक दूसरे के अंगों को निगल रहे, जडता से जर्जर तथा भ्रमग्रस्त ये जनसमूह आकाश म…
  36. Verse 36प्रिय रामजी, वृक्ष के ऊपर मच्छरों की पंक्ति की नाईं पाताल में जल-प्रवाह के सदृश आवर्त वृत…
  37. Verse 37कभी उदय तो कभी अस्त, कभी वृद्धि तो कभी हास, कभी उत्थान तो कभी पतन इस विविध दशाओं से सदा ह…
  38. Verses 38–39अनेक तरह के अपार युगावर्तो के दुःखानुभव से कठोर हुए मनोरूपी छेदनयोग्य व्रणविशेष के दुःख स…
  39. Verse 40केवल आत्मा ओर अनात्मा के विवेक से उत्पन्न ज्ञान से ही संसक्ति का उच्छेद हो सकता है, इसका…
  40. Verse 41जैसे अग्नि की ज्वाला तिनको को खा डालती है, वैसे ही तृष्णा इस संसार मे आसक्त मनवाले व्यवहा…
  41. Verse 42मतिवाले जीव के शरीरो की गिनती करने के लिए कोन समर्थ हो सकता है ? अर्थात्‌ कोई नहीं हो सकता
  42. Verse 43चोटी से लेकर मूल तक मेरु पर्वत का अवलम्बन करनेवाली मोतियों की लतारूपी गंगा के तरंगरूपी मो…
  43. Verse 44जिनका चित्त संसारमें आसक्त है, उन्हीं जीवों के लिए ये रम्य अन्तःपुर की पंक्तियाँ, जिनके न…
  44. Verse 45श्रीरामजी, आसक्त चित्तवाला अतएव दुःखों से सूखा हुआ पुरुष जल रही नरकरूपी अग्नियों के लिए ए…
  45. Verse 46इस जगती-तल में जो कुछ भी दुःखजाल है, वह सब आसक्तचित्त पुरुषों के लिए ही कल्पित है
  46. Verse 47जैसे जल के तरगों से संवलित बड़ी-बड़ी नदियाँ समुद्र के प्रति जाती हैं, वैसे ही सम्पूर्ण दु…
  47. Verse 48चिति- शक्ति ही जिसका स्वरूप है, जिसने भारभूत शरीर को धारण किया है ओर जो जीव के लिए जन्म ओ…
  48. Verse 49हे श्रीरामजी, जैसे वर्षाकाल में बड़ी-बड़ी नदियाँ महान्‌ विस्तार को प्राप्त होती हैं, वैसे…
  49. Verse 50हे रामजी, भीतरी आसक्ति शरीरो के लिए अंगारे है ओर भीतरी आसक्ति का परित्याग अंगों के लिए उत…
  50. Verse 51अवलम्बन के लिए तृणविशेषों को चाहनेवाली लता जैसे अवलम्बित तृणो से जनित अग्नि से दग्ध हो जा…
  51. Verse 52यहाँ प्रकृति के कार्य देह आदि के साथ जीव का सम्बन्ध होने के कारण जीव प्रकृति" कहा गया है…
  52. Verse 53विद्या विषय में उत्तम उदय हो प्राप्त हुए यानी प्रबद्ध हुए अविद्या विषय में (प्रपंच में )…