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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 69, Verse 2

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 69, verse 2 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उपशम प्रकरण · सर्ग 69 · श्लोक 2

संस्कृत श्लोक

न सक्तमिह चेष्टासु न चिन्तासु न वस्तुषु । नाकाशे नाप्यधो नाग्रे न दिक्षु न लतासु च ॥ २ ॥

हिन्दी अर्थ

वसिष्ठजी ने कहा : भद्र, शरीर (क्षेत्र) ओर शरीरी (क्षेत्रज्ञ) आत्मा का जो विभाग है यानी शरीर जड़ है और आत्मा चेतन है, यों जो उनकी विरुद्ध स्वभावता है, उसका भली प्रकार केवल पर्यालोचन न करने से ही एक दूसरे में एक दूसरे का तादात्म्य और एक दूसरे में एक दूसरे के धर्मों का विनिमय होता है। इसी विनिमय भावना से शरीर में उत्पन्न हुआ जो आत्माभिमान है यहीं संग कहलाता है और इसी संग से संसाररूपी बन्धन उत्पन्न होता है