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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 69, Verse 3

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 69, verse 3 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उपशम प्रकरण · सर्ग 69 · श्लोक 3

संस्कृत श्लोक

न बहिर्विपुलाभोगे न चैवेन्द्रियवृत्तिषु । नाभ्यन्तरे न च प्राणे न मूर्धनि न तालुनि ॥ ३ ॥

हिन्दी अर्थ

संग के अन्यान्य लक्षण कहते हैं। आत्मा का स्वरूप असीम है यानी उसका काल से, देश और वस्तु से किसी तरह परिच्छेद नहीं हो सकता, अज्ञानवश उसमें उक्त त्रिविध परिच्छिन्नता का निश्चय हो जाने पर जीव का अपना अपरिच्छिन्न सुखस्वभावता का विस्मरण हो जाता है, इस प्रकार के उक्त विस्मरण से इधर उधर के तुच्छ विषयों से वह आभ्यन्तर सुख चाहने लगता है, अतः जो वैषयिक सुखार्थिता है, यही बन्धन की हेतु संग कहलाती हे