Upashama Prakarana (Dissolution) · Sarga 38
24 verse-groups
- Verses 1–2अड़तीसवाँ सर्ग जगत् की व्यवस्था की सिद्धि के हेतु दैत्यकुल के रक्षार्थ प्रह्नाद के प्रबो…
- Verse 3वे स्वर्ग का अवलोकन कर, भूलोक के निवासियों के शुभाशुभ आचरण का अवलोकन कर अपने मन से दैत्यो…
- Verses 4–6पाताल में दानवराज प्रह्लाद के निश्चल समाधि में स्थित होने पर इन्द्र के नगरभूत स्वर्ग में…
- Verse 7प्रह्माद के समाधि से साम्राज्य में विश्रान्त होने से ओर पाताल के नायकरहित होने पर यह सृष्…
- Verse 8दैत्यों के न रहने पर प्रतिस्पर्धा से रहित पद को प्राप्त हुए देववृन्द जैसे अनावृष्टि के सम…
- Verse 9जैसे जल से रहित लता शुष्कता को प्राप्त होती है वैसे ही अभिमानशून्य होने के कारण स्वर्ग सु…
- Verse 10देववृन्द के शान्ति को प्राप्त होने पर- मुक्तेश्च बिभ्यतो देवा मोहेनापिदधुर्नरान्। तस्माद…
- Verse 11यज्ञ आदि क्रियाओं के उच्छिन्न होने पर कर्मभूमि व्यर्थ हो जायेगी और कर्म के व्यर्थ होने पर…
- Verse 12कर्म का उच्छेद हो, इससे आपकी क्या क्षति होगी ? ऐसा कोई कहे, तो इस पर कहते हैं। प्रलयपर्यन…
- Verse 13इस प्रकार इन जगतों के विलीन होकर नष्ट होने पर अपनी लीला का नाश करने वाले मुझसे क्या उचित…
- Verse 14अपनी लीला का नाश होने से मैं भी जिसमें चन्द्रमा, सूर्य और तारे नष्ट हो गये ऐसे इस शून्य ज…
- Verse 15इस प्रकार अनवसर में ही जगत के नष्ट होने पर देव, मनुष्य आदि जीव वर्ग का मैं कल्याण नहीं दे…
- Verse 16दैत्यो के उद्योग से देवता जिगीषु (उद्यमी) बनेंगे, देवताओं के कारण यज्ञ, तप आदि क्रियाएँ ह…
- Verse 17इसलिए पाताल में जाकर जैसे वसन्त आदि ऋतु वृक्ष को फिर पूर्ववत् स्थित करती हे वैसे ही मैं…
- Verse 18यदि मैं प्रह्नाद को छोड दूसरे को दानवराज बनाऊँ, तो वह निश्चय देवताओं पर चढ़ाई कर देगा
- Verse 19प्रह्लाद का तो यह शरीर परम पवित्र ओर अन्तिम है। इस देह से वह कल्प पर्यन्त रहेगा
- Verse 20देहधारी प्रह्लाद को कल्प पर्यन्त यहीं रहना होगा, इस प्रकार की परमेश्वर की नियति दैवी नियम…
- Verse 21इसलिए जैसे गर्ज रहा मेघ पर्वत नदी के तट पर सोय हुए मयूर को जगाता है वैसे ही पाताल में जाक…
- Verse 22जैसे मन की चेष्टा से रहित मणि अपने में संनिहित वस्तु के प्रतिबिम्ब को धारण करती हे वैसे ह…
- Verse 23इस प्रकार सुर ओर असुरों के साथ यह सृष्टि नष्ट नहीं होगी तथा सुर ओर असुरो का दन्द युद्ध हो…
- Verse 24यद्यपि स्रष्टव्य जगत् के सृष्टि ओर संहार ये दोनों मेरे लिए समान ही हैं तथापि यह पूर्वोक्…
- Verse 25यदि कोई शंका करे, योगनिद्रा द्वारा स्वरूपयुख गमन का त्यागकर दैत्यपुर गमन आपके लिए उचित नह…
- Verse 26के समान संसारलीला नहीं करता
- Verse 27हम मर्यादारहित दस्युओं के अनाचार से भयानक पाताल में जाकर जैसे सूर्य कमल को विकसित करता हे…