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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 38, Verse 10

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 38, verse 10 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उपशम प्रकरण · सर्ग 38 · श्लोक 10

संस्कृत श्लोक

देवौघे शान्तिमायाते भुवि यज्ञतपःक्रियाः । अदेवत्वफलाः सर्वाः शममेष्यन्त्यसंशयम् ॥ १० ॥

हिन्दी अर्थ

देववृन्द के शान्ति को प्राप्त होने पर- मुक्तेश्च बिभ्यतो देवा मोहेनापिदधुर्नरान्‌। तस्मादेषां तन्न प्रियं यदेतन्मुष्या विद्युः । तस्मादेतेसूरा विषघ्नमाचरन्ति शपन्ति च । (मनुष्यों की मुक्ति से भयभीत देवता उन्हें मोह से आच्छन्न करते हैं, इसलिए देवताओं को यह प्रिय नहीं हैं कि मनुष्य ज्ञानी हों, वे मनुष्यों के मुक्तिमार्ग मे विघ्न डालते हैं और उन्हें शाप देते हैं ।) प्रमादिनो बहिश्चित्ताः पिशुनाः कलहोत्सुकाः । संन्यासिनोऽपि दृश्यन्ते देवसंदूषिताशयाः ॥ (संन्यासी भी आलसी, विषयवासना युक्त, चुगलखोर, झगड़ालू देखे जाते हैं, क्योंकि उनका मन देवताओं द्वारा दूषित रहता है) - इत्यादि श्रुति, स्मृति, वार्तिक आदि से सिद्ध मनुष्यों की देवदूषित चित्तता की असिद्धि से मनुष्यों में भी शमआदि की प्राप्ति होने से पृथिवी में सब यज्ञ आदि क्रियाएँ देवत्वरूप फल से रहित होकर उच्छेद को प्राप्त होगी, इसमें कोई सन्देह नहीं है