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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 38, Verse 15

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 38, verse 15 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उपशम प्रकरण · सर्ग 38 · श्लोक 15

संस्कृत श्लोक

अकाण्ड एवमेवं हि जगत्युपशमं गते । नेह श्रेयो न पश्यामि मन्ये जीवन्तु दानवाः ॥ १५ ॥

हिन्दी अर्थ

इस प्रकार अनवसर में ही जगत के नष्ट होने पर देव, मनुष्य आदि जीव वर्ग का मैं कल्याण नहीं देखता यह बात नहीं है मैं कल्याण देखता ही हूँ। क्योकि 'वैराग्यात्प्रकृती लय:* इस स्मृति के अनुसार प्रकृति में लय होने पर सुषुप्ति की तरह सर्व दुःख निवृत्तिरूप श्रेय की सिद्धि है ही, किन्तु, “तमेवेतं वेदानुवचनेन ब्राह्यणा विविदिषन्ति“ "अनेक जन्म संसिद्धस्ततो यातिपरांगतिम्‌' इत्यादि श्रुतिस्मृति से सिद्ध अनेक जन्मों में किये निष्काम कर्म से होनेवाली विविदिषा द्वारा तत्त्वसाक्षात्कार न होने से मूलअज्ञानरूप आवरण की निवृत्ति न होने के कारण बीज के रहते फिर आवृत्ति की आशंका हो सकती है । निरतिशयानन्द प्राप्ति रूप श्रेय किसी को भी नहीं हो सकता, इसलिए क्रमशः सबका उक्त श्रेय की प्राप्ति के लिए दानव जीये