Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 38, Verses 4–6
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 38, verses 4–6 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 38 · श्लोक 4-6
संस्कृत श्लोक
तत्र स्थिरसमाधाने स्थिते प्रह्लाददानवे ।
दृष्ट्वा संपदमिन्द्रस्य पुरे प्रौढिमुपागताम् ॥ ४ ॥
व्यालतल्पतलस्थस्य क्षीरोदार्णवशायिनः ।
शङ्खचक्रगदापाणेर्देहस्यान्तरचारिणः ॥ ५ ॥
पद्मासनस्थस्य मनः शरीरेणातिभास्वता ।
इदं संचिन्तयामास त्रैलोक्यालमहालिना ॥ ६ ॥
हिन्दी अर्थ
पाताल में दानवराज प्रह्लाद के निश्चल
समाधि में स्थित होने पर इन्द्र के नगरभूत स्वर्ग में संपत्ति को अतिवृद्धि को प्राप्त हुई देखकर पहले
क्षीरसागर में सोये हुए तदनन्तर जाग कर शेषशय्या पर स्थित वहाँ पर भी पद्मासन लगाकर बैठे हुए
हाथ में शंख, चक्र ओर गदा धारण किये हुए भगवान् विष्णु के मन ने त्रिलोकरूपी कमल के महा भ्रमररूपी
अपने देदीप्यमान शरीर से यह विचार किया