Upashama Prakarana (Dissolution) · Sarga 33
21 verse-groups
- Verses 1–2बत्तीसवाँ सर्गे समाप्त तेंतीसवाँ सर्ग हरिभक्ति से प्रह्नाद के विवेक आदि गुणों का उदय और प…
- Verse 3जैसे जला हुआ बीज अंकुर पैदा नहीं कर सकता, वैसे ही इसके बाद इस दानव को मातृगर्भनिवास नहीं…
- Verse 4देवताओं ने जो उसकी भगवद्भक्ति को अनुचित दोषरूप ठहराया था, उसका परिहार करते हैं। यदि गुणवा…
- Verse 5हे देवश्रेष्ठों, आप लोग अपने-अपने अद्भुत लोकों को जाइये प्रह्माद की यह भक्ति आदि गुणवत्ता…
- Verse 6श्रीवसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामचन्द्रजी, भगवान देवताओं से यह कह कर वहाँ क्षीरसागर की लहर…
- Verse 7जैसे पहले आकाश से समुद्र में गिरा हुआ जलकणसमूह मन्दराचल से कम्पित सागर से फिर आकाश में चल…
- Verse 8तवसे प्रह्लाद के प्रति देवताओं की मित्रता हो गई। जिस पुरुष या विषय में अपने पूजनीय पिता,…
- Verses 9–11इस प्रकार के भक्तिमान प्रह्लाद ने देवाधिदेव भगवान विष्णु की प्रतिदिन मन, कर्म ओर वचन से प…
- Verse 12स्थल में जैसे कमलिनी का प्रेम नहीं होता वैसे ही दर्शन योग्य समाज, उत्सव आदि कौतुको में उस…
- Verse 13जैसे न गुंथा हुआ मोती निर्मल मोती पर स्थिर नहीं रह सकता वैसे ही भोगरूपी रोगों के विषयरूपी…
- Verses 14–15यदि कोई पूछे कि तब कैसा उसका चित्त था, तो इस पर कहते हैं। उसके चित्त ने भोग आदि की कल्पना…
- Verses 16–17तदनन्तर भक्तों को आह्वादित करनेवाले भगवान् विष्णु पाताल मार्ग से पूजा देवगृह मे प्रह्लाद…
- Verse 18परम प्रसन्न हुए प्रह्ाद ने पूजागृह में आये हुए नेत्रो के सामने स्थित भगवान् श्रीहरि की म…
- Verse 19प्रह्लाद ने कहा : मे त्रिभुवन की सुरक्षित स्थिति के अनुकूल सुन्दर कोश गृहरूप, बाह्य ओर आभ…
- Verse 20नीलकमल ओर नीलमणि के समान कान्तिवाले, ओर शरत्कालीन निर्मल आकाश के मध्यभाग के तुल्य श्यामल,…
- Verse 21जिनका शरीर भरो की राशि के समान कोमल हे, जिनका शुभ्र शंख सफेद कमल के कुण्डल के समान सुशोभि…
- Verses 22–23सफेद नखरूपी तारे जिसमें बिखरे हँ, मन्द-मन्द हास से प्रकाशमान मुख ही जिसमें पूर्ण चन्द्रबि…
- Verse 24ताजे फूले हुए नाभिकमल के पराग से वक्षःस्थल में पीलेवर्णवाले, प्रकाशमान लक्ष्मी के शरीर से…
- Verse 25दैत्यरूपी नलिनी के लिए हिमपातरूप, देवरूपी नलिनी केलिए सदा उदित सूर्यमण्डलरूप, ब्रह्मारूपी…
- Verse 26त्रिभुवनरूपी कमलिनी के लिए सूर्यरूप, अन्धकार के सदृश आच्छादक अज्ञान के लिए श्रेष्ठ दीपरूप…
- Verse 27श्रीवसिष्ठजी ने कहा : इस प्रकार के विविध गुणों से युक्त स्तुतिवचनं से पूजित असुरो का विना…