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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 33, Verses 22–23

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 33, verses 22–23 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उपशम प्रकरण · सर्ग 33 · श्लोक 22,23

संस्कृत श्लोक

सितनखगणतारकावकीर्णं स्मितधवलाननपीवरेन्दुबिम्बम् । हृदयमणिमरीचिजालगङ्गं हरिशरदम्बरमाततं प्रपद्ये ॥ २२ ॥ अविरलकृतसृष्टिसर्वलीनं सततमजातमवर्धनं विशालम् । गुणशतजरठाभिजातदेहं तरुदलशायिनमर्भकं प्रपद्ये ॥ २३ ॥

हिन्दी अर्थ

सफेद नखरूपी तारे जिसमें बिखरे हँ, मन्द-मन्द हास से प्रकाशमान मुख ही जिसमें पूर्ण चन्द्रबिम्ब हे एवं कौस्तुभ मणि की किरणराशि ही जिसमें आकाश गंगा है, इस प्रकार के विस्तृत हरिरूपी शरत्कालिन आकाश की मैं शरण लेता हूँ। रची गई घनी सृष्टि जिनमें बिना किसी संकोच के निविष्ट हे, सत्त्व आदि मायागुणों से होनेवाले अनन्त कल्याण गुणगणों से जिनकी चिरन्तन मूर्ति रमणीय है, प्रलयकाल में वटपत्र पर सोनेवाले बालकरूप अविनाशी, अज, अविकारी, सर्वव्यापक, भगवान्‌ की शरण मैं जाता हूँ