Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 33, Verse 27
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 33, verse 27 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 33 · श्लोक 27
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
इति गुणबहुलाभिर्वाग्भिरभ्यर्चितोऽसौ हरिरसुरविनाशः श्रीनिषण्णांसदेशः ।
जलद इव मयूरं प्रीतिमान्प्रीयमाणं कुवलयदलनीलः प्रत्युवाचासुरेन्द्रम् ॥ २७ ॥
हिन्दी अर्थ
श्रीवसिष्ठजी ने कहा : इस प्रकार के विविध गुणों से युक्त स्तुतिवचनं से पूजित असुरो का
विनाशकरनेवाले नीलकमल के सदृश श्यामल भगवान् श्रीहरि, जिनका कण्ठ श्रीलक्ष्मीजी से आलिंगित
था, प्रसन्न होकर जैसे मेघ मयूर के प्रति बोलता है वैसे ही दैत्यराज प्रह्लाद के लिए बोले