Sthiti Prakarana (Existence) · Sarga 26
पचीसवाँ सर्ग समाप्त छब्बीसवाँ सर्ग देवताओं के साथ पाताल से निकले हुए दाम, व्याल और कट आदि के घोर संग्राम का वर्णन ।
32 verse-groups
- Verse 1श्रीवसिष्ठजी ने कहा : हे रामचन्द्रजी, दैत्यराज शम्बरासुर ने इस प्रकार विचारकर दाम, व्याल…
- Verse 2भीषण सिंहनादवाले आयुधधारी दैत्यसागर से, सागर तट की झाड़ियों से, पर्वतो की कन्दराओं से आशय…
- Verse 3दाम, व्याल और कट से बलशाली हुए दानवों ने अन्तरिक्ष ओर पृथिवी के मध्यवर्ती आकाश को ठसाठस भ…
- Verse 4इसके बाद मेरूपर्वत के निकुजो से ओर कन्दराओं से प्रलयकाल की तरह क्षुब्ध ओर भयंकर देवताओं क…
- Verse 5उन देव ओर असुर सेनाओं का वन के मध्य में वह युद्ध अकाल में हुए दुःसह प्रलय के समान भीषण हुआ
- Verse 6इसके बाद कुण्डलो की कान्तियों के तेज से अन्धकार का नाश कर चुके मस्तक, प्रलयकाल में नष्ट ह…
- Verse 7प्रलयकाल के वायुओं के महाप्रवाहों से पड़ी हुई दराररूपी हँसी से युक्त तथा दुर्दान्त योद्धा…
- Verse 8पर्वत की शिलाओं के तुल्य शरत्रास्त्रों के आघात से जिनकी दीवार ढह गई थी। भयभीत सिंह जिनमें…
- Verse 9परस्पर के प्रहारो से नष्ट हुए शस्त्रास्त्रों से निकली हुई चंचल आग की चिनगारियाँ प्रलयकाल…
- Verse 10रक्त-मांस की राशि से पूर्ण एकमात्र सागरके तटपर बैठे हुए, प्रलयकाल के उत्पातभूत तालवृक्षों…
- Verses 11–12इधर-उधर फैलती हुई रुधिर की धाराओं से बादलों के समान धूलि जिसमें शान्त हो गई थी, ऐसे आकाश…
- Verse 13चल रही तलवार की धारों के वायु से जिनकी दीवारें गिरा दी गई थी अतएव प्रलयकाल की अग्नि से तह…
- Verse 14अश्वमेघ यज्ञों से वृद्धि को प्राप्त हुए से देवता लोग भी अस्त्रौ से रहित हुए असुरों के पास…
- Verse 15तदनन्तर जैसे बिल्लियाँ झपट कर बूढ़े चूहों को पकड़ती हैं, वैसे ही उन्होंने राक्षसों के ऊपर…
- Verse 16जिनके बाहुरूपी वृक्षों पर शस्त्रास्त्ररूपी फूल खिल रहे थे और शस्त्र रूपी पल्लव शोभित हो र…
- Verse 17जैसे वायु सुमेरु पर्वत पर फूलों के समूहों से वनों को भर देता है वैसे ही परस्पर के प्रति फ…
- Verse 18अन्तरिक्ष और पृथ्वी के अवकाशरूपी गूलर के फल के अन्दर रहनेवाले महामशकों के संघ के तुल्य दे…
- Verse 19दिग्गज आदि द्वारा कुचले जा रहे लोगों के रण कोलाहल का वर्णन करते हैं। इसके अनन्तर ऊँचे ताल…
- Verse 20वह कहीं पर आकाश में अत्यन्त घन होने के कारण मानों गज बनाता हुआ सा, कहीं पर मुट्ठी में पकड…
- Verse 21रथ के ऊपर पड़ने से पीसे गये शस्त्रों से पर्वतों में शब्द करता हुआ वह कोलाहल नाचनेवाले नट…
- Verses 22–23वह प्रलयकाल के हेतुभूत अग्नि, वायु आदि से उल्लसित होनेवाले, ब्रह्मा के दिन-भूत सृष्टिकाल…
- Verse 24ब्रह्माण्डरूपी दीवार में टकराकर लौटने से बढ़ा हुआ और उद्गम स्थान से भी निकलता हुआ वह कोला…
- Verse 25मन्दराचल से अमृतमन्थन के समय अमृतोत्पत्ति होने पर अमृत के प्रति आसक्ति होने के कारण अमृतो…
- Verses 26–29क्षुब्ध हुई दोनों सेनाओं का ऐसा भीषण युद्ध हुआ कि उनमें नगर, ग्राम, पर्वत, वन और मनुष्य प…
- Verses 30–32उस युद्ध मे आयुधरूपी आँधी से पीसे गये वैमानिको के समूह गिर रहे थे, अस्त्र से उत्पन्न हुए…
- Verses 33–36वह युद्ध गिर रही दैत्य सेना से उत्पन्न हुई अथाह रक्त-राशिरूप जल से युक्त था । उसमें खून स…
- Verses 37–39राष्ट्र, नगर, वन ग्राम और गुफाएँ सब के सब नष्ट हो गये थे, असंख्य असुर, हाथी, घोडे ओर मनुष…
- Verses 40–45उसमें कुपित हुई अग्नि की जलती हुई विविध ज्वाला ओं से दानव जलाये गये थे, एक अंजलिपुट से ला…
- Verses 46–51असुर और पिशाचों के अस्त्रो से उत्पन्न किये गये तोमर, मुद्गर, मुसल आदि अस्त्रो की परम्परा…
- Verses 52–54सब वृक्षों की शाखाओं के अग्रभाग में बड़े-बड़े चंचल शव झूल रहे थे। बाणराशि के वन रूप से नि…
- Verses 55–57उसमें सातों लोकों से गिरे हुए दीवार के टुकड़ों सा सारा आकाश व्याप्त था, कल्पकाल के भीषणमे…
- Verse 58अब औत्पातिक आँधी का वर्णन करते हैं। वरं के गिरने से जिनके अंग खण्डित हो गये थे और जिन्हों…