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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 26, Verses 11–12

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 26, verses 11–12 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

स्थिति प्रकरण · सर्ग 26 · श्लोक 11,12

संस्कृत श्लोक

प्रस्फुरद्रुधिरासारशान्तपांसुपयोधरे । व्योम्नि हेतिहतक्षुण्णा मौलिकुण्डलकोटयः ॥ ११ ॥ बभूवुर्भास्कराकारैः कल्पभूरुहधारिभिः । प्रहारदलिताद्रीन्द्रैर्दैत्यैर्निर्विवरा दिशः ॥ १२ ॥

हिन्दी अर्थ

इधर-उधर फैलती हुई रुधिर की धाराओं से बादलों के समान धूलि जिसमें शान्त हो गई थी, ऐसे आकाश में आयुधो के प्रहारों से चूर-चूर किये गये मस्तकों के करोड़ों कुण्डल सूर्य के आकार से युक्त हो गये थे। अपने प्रहारों से हिमालय आदि पर्वतराजो को छिन्‍न-भिन्‍न करनेवाले, प्रहार करने के लिए उखाड़े हुए कल्पवृक्षो को धारण करनेवाले, सूर्य के आकारके सदुश आकारवाले दैत्यों से युक्त दिशाएँ ऐसी पट गई, कहीं पर एक छिद्र भी दिखाई न देता था