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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 26, Verses 40–45

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 26, verses 40–45 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

स्थिति प्रकरण · सर्ग 26 · श्लोक 40-45

संस्कृत श्लोक

कुपिताग्निज्वलज्ज्वालाजालज्वलितदानवम् । एकाञ्जलिपुटानीतसमुद्रोत्सादितानलम् ॥ ४० ॥ चण्डदैत्यातिसंभारशिलीकृतमहाज्वलम् । वनव्यूहेन्धनाग्न्यर्चिर्द्राविताम्बुशिलोच्चयम् ॥ ४१ ॥ अस्त्रनिर्मितदुर्वारतमःकल्पान्तरात्रिकम् । मायासूर्यगणोद्द्योतैः पीतातनुतमःपटम् ॥ ४२ ॥ मायाग्निवर्षनिष्पीतकलाभ्रघनवर्षणम् । ससीत्काराग्निवमनशस्त्रसंघट्टवर्षणम् ॥ ४३ ॥ वज्रवर्षास्त्रनिर्धूतशैलवर्षास्त्रसंभ्रमम् । निद्राबोधास्त्रयुद्धाढ्यं संघर्षावग्रहाश्रयम् ॥ ४४ ॥ वहत्क्रकचवृक्षास्त्रं जलाग्न्यस्मरणान्धितम् । ब्रह्मास्त्रयुद्धविषमं तमस्तेजोस्त्रसारितम् ॥ ४५ ॥

हिन्दी अर्थ

उसमें कुपित हुई अग्नि की जलती हुई विविध ज्वाला ओं से दानव जलाये गये थे, एक अंजलिपुट से लाये गये समुद्र से देवताओं द्वारा जलाई गई अग्नि राक्षसा द्वारा बुझाई गई थी, प्रचण्ड दैत्यों द्वारा शैल, शिला आदि बोझदार वस्तुओं के फेंकने से देवताओं द्वारा जलाई गई अग्नि रोक दी गई थी, वनसमूहरूप इन्धनो से सुलगाई गई अग्नि की ज्वालाओं से पिचलाये गए पर्वत जडमय हो गये थे उस युद्ध मेँ कभी अस्त्रो से रचित निबिड अन्धकार से प्रलयकाल की रात्रि हो गई थी, कभी माया के सूर्य समूह के प्रकाशोंसे घोर अन्धकार पटल नष्ट कर दिया गया था, माया की अग्नि की वृष्टि से माया के कौशल से बनाये गये मेघों की वृष्टि नष्ट कर दी गई थी, सीत्कार के साथ अग्नि उगलनेवाले शत्रो के परस्पर संघटन की वृष्ट हो रही थी । शैलवृष्टिरूपी अस्त्रो से शेलवृष्टिरूपी अस्त्रं का विलास नष्ट किया गया था, निद्रास्त्र और प्रबोधास्त्रों के युद्ध से वह पूर्ण था, शत्रु के अभिभवरूपी अवग्रह (वर्णप्रतिबन्धक वायु विशेष) से वह युक्त था। उसमें क्रकचास्त्र और वृक्षास्त्र चल रहे थे, जल और अग्नि के व्यामोह से वह अन्धकारित था, ब्रह्मास्त्र के युद्ध से भीषण था एवं अंधकारास्त्र और तैजसास्त्र से कर्बुरित था