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Sthiti Prakarana (Existence) · Sarga 17

सोलहवाँ सर्ग समाप्त सत्रहवाँ सर्ग शुद्ध चित्तं की सत्यसंकल्पता का वर्णन ।

25 verse-groups

  1. Verse 1शुक्राचार्यजी का अप्सरा, स्वर्ग, आदि मनोरथ चिरकाल के उपभोग से जैसे सफल सा हुआ था वैसे ओर…
  2. Verses 2–3प्रतिभाओं के फलोपभोग द्वारा सफल होने में दो कारण हैं, एक तो सत्यसंकल्पता के योग्य वित्तशु…
  3. Verse 4अन्य ब्रह्मवेत्ताओं के भी सत्यसंकल्पत्व में राग आदि दोषों के क्षय से होनेवाली शुद्ध चिति…
  4. Verse 5ओर लोगो में चित्त की शुद्धि न होने से सत्यसंकल्पता की असिद्धि से प्रथम कल्प का सम्भव न हो…
  5. Verse 6जैसे बीज के भीतर स्थित अंकुर, पत्ते आदि अपने स्वरूपको प्रकट करते हैं यानी चमत्कार को प्रा…
  6. Verses 7–8जो यह जगत हम लोगों को दृष्टिगोचर हुआ है, वैसा ही सारा जगत प्रत्येक जीव में मिथ्या ही उदित…
  7. Verse 9यदि प्रत्येक जीव के संसार प्रत्येक मे अलग अलग उदित हुए हैं, तो वे प्रतीत क्यो नहीं होते,…
  8. Verse 10यदि कोई शंका करे कि सब लोग सब के संसारो को अलग-अलग क्यो नहीं देखते, तो इस पर कहते हैं। जै…
  9. Verse 11इसी प्रकार संकल्परूपी आकाश में अनेक जगद्रूपी नगर हैं; पर वे ज्ञानदृष्टि के बिना मिथ्या प्…
  10. Verse 12इसी प्रकार के संकल्पमात्र शरीरवाले सुख-दुःखमय पिशाच, यक्ष, राक्षस भी हैं। भाव यह कि पिशाच…
  11. Verses 13–14हे रघुनन्दन, शुक्र के तुल्य ही अपने संकल्परूप आकारवाले मिथ्या को सत्य समझनेवाले ये तुम लो…
  12. Verse 15जैसे एकमात्र वसन्त ऋतु का रस ही वन, लता, गुल्म आदिरूप से उदित होता है वैसे ही एक मात्र पर…
  13. Verse 16अपना प्राथमिक संकल्प ही जगदाकार प्रतीति को प्राप्त हआ, यह कैसे जाना जा सकता है ? इस पर कह…
  14. Verse 17अपने अनादि अज्ञान के मध्य में स्थित चित्त ही इस प्रकार के विविध व्यापारों से युक्त, प्रत्…
  15. Verse 18यह जगत्सत्ता प्रतिभासकाल में ही रहती है, वास्तविक अधिष्ठान का दर्शन होने पर यह रह नहीं सक…
  16. Verse 19चित्तरूपी हाथी का बन्धनस्तम्भरूप यह जगज्जाल है, ऐसा जो पहले कहा था, उसी को स्फुट करते हैं…
  17. Verses 20–21चित्त की सत्ता से जगत की सत्ता कहाँ देखी गई है, ऐसा यदि किये, तो युनिये, शुद्ध चित्तवालों…
  18. Verse 22जैसे मलिन वस्त्र में सुन्दर रंग नहीं टिकता, वैसे ही अज्ञान मलिन चित्त में अद्वैतात्मज्ञान…
  19. Verse 23आपने वासनानुसारी जगद्भरम होता है, ऐसा कहा है, उस वासनानुसार जगद्भ्रम में पहले अननुभूत स्व…
  20. Verse 24श्रीवसिष्ठजी ने कहा : श्रीरामचन्द्रजी, पिता से उत्पन्न चक्षु आदि से या पिता के वचन से और…
  21. Verse 25चैतन्य से अधिष्ठित सजीव अविद्या में स्थित यह सब पिता और शास्त्र के कारण ही क्रम से ऐसे उद…
  22. Verse 26जीव जिस वासना से बद्ध रहता है, उसी को अपने अन्दर देखता है, स्वप्न में अपने से कल्पित शरीर…
  23. Verse 27हे श्रीरामचन्द्रजी, यह संसारभेद रात्रि में सैनिक पुरुष द्वारा स्वप्न में देखे गये सैनिकों…
  24. Verse 28यदि ऐसा है, तो मनुष्य ओर उसके संसार को अन्य लोग नहीं देख सकेंगे, ऐसी अवस्था में गुरुजनों…
  25. Verses 29–31उक्त दोनों दोष जिस प्रकार प्राप्त न हो, उस प्रकार की व्यवस्था से श्रीवसिष्ठजी उत्तर देते…