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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 17, Verses 7–8

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 17, verses 7–8 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

स्थिति प्रकरण · सर्ग 17 · श्लोक 7,8

संस्कृत श्लोक

यदिदं दृश्यते विश्वमेवमेवाखिलं जगत् । प्रत्येकमुदितं मिथ्या मिथ्यैवास्तमुपैति च ॥ ७ ॥ नास्तमेति नचोदेति जगत्किंचन कस्यचित् । भ्रान्तिमात्रमिदं मायामुग्धेव परिजृम्भते ॥ ८ ॥

हिन्दी अर्थ

जो यह जगत हम लोगों को दृष्टिगोचर हुआ है, वैसा ही सारा जगत प्रत्येक जीव में मिथ्या ही उदित है ओर मिथ्या ही अस्त को प्राप्त होता है । परमार्थ दृष्टि से तो किसी का कोई भी जगत न अस्त को प्राप्त होता है और न उदित होता है। यह केवल भ्रान्ति मात्र है, एकमात्र माया ही उन्मत्त की नाई उल्लास को प्राप्त होती है