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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 17, Verse 5

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 17, verse 5 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

स्थिति प्रकरण · सर्ग 17 · श्लोक 5

संस्कृत श्लोक

यथा भृगुसुतस्यैव विभ्रमः प्रोत्थितः स्वयम् । प्रत्येकमप्येवमेव दृष्टान्तोऽत्र भृगोः सुतः ॥ ५ ॥

हिन्दी अर्थ

ओर लोगो में चित्त की शुद्धि न होने से सत्यसंकल्पता की असिद्धि से प्रथम कल्प का सम्भव न होने पर भी द्वितीय कल्प के अनुसार पूर्व देह के मरण के समय उद्भूत कर्मों की वासना आदिके अनुगुण खुख- दुःख के भोग के अनुकूल जगत के प्रतिमान में शुक्राचार्य की समता है ही, इस आशय से कहते हैं । जैसे शुक्राचार्य को अपने-आप भ्रान्ति हुई थी, प्रत्येक जीव में वैसी भ्रान्ति है ही, इस विषय में शुक्राचार्य ही दृष्टान्त हैं