Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 17, Verses 29–31
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 17, verses 29–31 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
स्थिति प्रकरण · सर्ग 17 · श्लोक 29,30
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
मलिनं हि मनोऽवीर्यं न मिथः श्लेषमर्हति ।
अयोऽयसि च संतप्ते शुद्धे तप्तं तु लीयते ॥ २९ ॥
चित्ततत्त्वानि शुद्धानि संमिलन्ति परस्परम् ।
एकरूपाणितोयानि यान्त्यैक्यंनाविलानि हि ॥ ३० ॥
शुद्धिर्हि चित्तस्य विवासनत्वमभूतसंवेदनमेकरूपम् ।
तस्याशु शुद्ध्या भवति प्रबुद्धस्तन्मात्रयुक्त्या परसंगमेति ॥ ३१ ॥
हिन्दी अर्थ
उक्त दोनों दोष जिस प्रकार प्राप्त न हो, उस प्रकार की व्यवस्था से श्रीवसिष्ठजी उत्तर देते हैं।
श्रीवसिष्ठजी ने कहा : वत्स श्रीरामचन्द्रजी, मलिन मन शुद्ध मन में परस्पर सम्बन्धरूप मेल को
प्राप्त नहीं होता, क्योकि वह शुद्ध मन के साथ सम्बन्ध के योग्य सूक्ष्मता से सवीर्य (शुद्ध में मिलने योग्य
सूक्ष्मतारूप सामर्थ्य से युक्त) है। शुद्ध चित्त तत्त्व परस्पर एक दूसरे से ऐसे मिलते हैं जैसे एकरूपवाले
जल परस्पर एकता को प्राप्त होते हैं, किन्तु अशुद्ध चित्त कलुषित जलों के तुल्य एकता को प्राप्त नहीं
होते। भाव यह निकला कि सवीर्य होने के कारण ही देवताओं का जैसे दूसरे के स्वप्न में प्रवेश करके
वरदानरूप अनुग्रह देखा जाता है, वैसे ही शिष्य के मन से कल्पित जगत में प्रवेश द्वारा गुरूका मन
उपदेश देने में समर्थ है, इसलिए आपके द्वारा उद्भावित प्रथम दोष का खण्डन हो गया । जगत की
सर्वसाधरणता तो हम मानते नहीं, अतः दूसरा दोष भी न रहा