Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 17, Verses 20–21
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 17, verses 20–21 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
स्थिति प्रकरण · सर्ग 17 · श्लोक 20,21
संस्कृत श्लोक
शुद्धस्य प्रतिभासो हि सत्यो भवति चेतसः ।
प्रमार्जनादिव मणेर्मलिनस्येह युक्तितः ॥ २० ॥
चिरमेकदृढाभ्यासाच्छुद्धिर्भवति चेतसः ।
अनाक्रान्तस्य संकल्पैः प्रतिभोदेति चेतसः ॥ २१ ॥
हिन्दी अर्थ
चित्त की सत्ता से जगत की सत्ता कहाँ देखी गई है, ऐसा यदि किये, तो युनिये, शुद्ध चित्तवालों
के सत्य संकल्प से उत्पन्न वस्तु में देखी गई है, ऐसा कहते हैं।
जैसे युक्तिपूर्वक मलिन मणि को साफ करने से शुद्ध प्रकाश निकलता है, वैसे ही चित्त का प्रतिभास
सत्य होता है। चिरकाल तक एकाग्रता के दृढ़ अभ्यास से चित्त की शुद्धि होती है। संकल्पो से अनाक्रान्त
यानी शुद्ध चित्त से स्वच्छता जनित प्रकाशमयता उदित होती है