Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 17, Verse 10
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 17, verse 10 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
स्थिति प्रकरण · सर्ग 17 · श्लोक 10
संस्कृत श्लोक
स्वप्नसंकल्पनगरव्यवहाराः परस्परम् ।
पृथग्यथा न दृश्यन्ते तथैते संसृतिभ्रमाः ॥ १० ॥
हिन्दी अर्थ
यदि कोई शंका करे कि सब लोग सब के संसारो को अलग-अलग क्यो नहीं देखते, तो इस पर
कहते हैं।
जैसे अन्य के स्वप्न ओर मनोरथ के नगरों के व्यवहार अन्य को दृष्टिगोचर नहीं होते, वैसे ही अन्य
के ये संसाररूपी भ्रम भी पृथक्-पृथक् नहीं दिखाई देते भाव यह कि जैसे अन्य का स्वप्न अन्य
पुरुषको दिखाई नहीं देता, वैसे ही अन्य का संसार भी अन्य को नहीं दिखाई देता