Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 17, Verse 27
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 17, verse 27 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
स्थिति प्रकरण · सर्ग 17 · श्लोक 27
संस्कृत श्लोक
प्रत्येकमुदितो राम नूनं संसृतिखण्डकः ।
रात्रौ सैन्यनरस्वप्नजालवत्स्वात्मनि स्फुटः ॥ २७ ॥
हिन्दी अर्थ
हे श्रीरामचन्द्रजी, यह संसारभेद रात्रि में सैनिक पुरुष द्वारा स्वप्न में देखे गये
सैनिकों के समूह के तुल्य अपनी आत्मा मेँ प्रत्येक जीव में उदय हुआ है । भाव यह है कि जैसे दिन में
सेन्यवासना से वासित सैनिक पुरुष रात्रि में स्वप्न मे प्रत्येक सेना को अपनी-अपनी वासना से कल्पित
नाना सेनाओं के रूप में देखते हुए भी सेन्यगत एकत्व को मानते ही हैं, वैसे ही प्रत्येक जीव में ये
संसारभेद उत्पन्न हुए हैं