Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 17, Verse 18
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 17, verse 18 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
स्थिति प्रकरण · सर्ग 17 · श्लोक 18
संस्कृत श्लोक
प्रतिभासवशादस्ति नास्ति वस्त्ववलोकनात् ।
दीर्घस्वप्नो जगज्जालमालानं चित्तदन्तिनः ॥ १८ ॥
हिन्दी अर्थ
यह जगत्सत्ता प्रतिभासकाल में ही रहती है, वास्तविक अधिष्ठान का दर्शन होने पर यह रह नहीं
सकती, ऐसा कहते हैं।
भ्रान्तिवश इसकी सत्ता है और अधिष्ठान तत्त्व के साक्षात्कार से इसका अस्तित्व मिट जाता है।
चित्तरूपी हाथी का बन्धनस्तम्भरूप यह जगज्जाल एक दीर्घं स्वप्न ही तो है