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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 17, Verse 23

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 17, verse 23 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

स्थिति प्रकरण · सर्ग 17 · श्लोक 23

संस्कृत श्लोक

श्रीराम उवाच । प्रतिभासात्मनि जगत्येते कालक्रियाक्रमाः । सोदयास्तमया जाताः कथं शुक्रस्य चेतसः ॥ २३ ॥

हिन्दी अर्थ

आपने वासनानुसारी जगद्भरम होता है, ऐसा कहा है, उस वासनानुसार जगद्भ्रम में पहले अननुभूत स्वर्ग, अप्सरा और जन्मपरम्परा आदिकी विचित्रता में वासनारूप बीज का संभव नहीं है, इसलिए शुक्र का उनमें आरोपक्रम कैसे हुआ, इस आशय से श्रीरामचन्द्रजी पूछते हैं : भगवन्‌, शुक्र के चित्त के प्रातिभासिक कल्पनारूप जगत में ये उदय और अस्त से युक्त काल- क्रियाक्रम किस कारण हुए ? उदयअस्तमय इससे प्रातिभासिक उदय और अस्त का प्रतिभासकाल में ग्रहण नहीं हो सकता, प्रतिभास से भिन्नकाल में उनका अनुभव ही नहीं है, इसलिए तद्विषयक वासना सिद्धनहीं होती और वासना की सिद्धि न होने पर क्रम की सिद्धि भी नहीं हो सकती, यह सूचित किया