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Sthiti Prakarana (Existence) · Sarga 16

पन्द्रहर्वो सर्ग समाप्त सोलहवाँ सर्ग काल के चले जाने पर काल की आज्ञानुसार शुक्राचार्य का अपने शरीर में प्रवेश करना तथा उनकी दैत्यों की गुरुता ओर जीवन्मुक्ति का वर्णन |

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  1. Verse 1वसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामचन्द्रजी, तदनन्तर भृगु तथा भृगुपुत्र शुक्राचार्य के विलापवचन…
  2. Verse 2काल ने कहा : हे परकार्यं साधक भृगुपुत्र, समंगा नदी के तट के इस तपस्वी शरीर का परित्याग कर…
  3. Verse 3हे निष्पाप शुक्राचार्यजी, ग्रहाधिकार को प्राप्त करानेवाले प्रारब्ध के उदयकाल में सर्वप्रथ…
  4. Verse 4महाकल्परूप ब्रह्मा के दिन का (हजार चौकडी का) अन्त होनेपर आप भृगुजी से उत्पन्न देह का, पुन…
  5. Verse 5हे महामते, पूर्वकल्प में उपार्जित कर्मो से प्राप्त शरीर द्वारा जीवन्मुक्तिरूप पद पाकर बड़…
  6. Verse 6आप लोगो का कल्याण हो, मेँ अपनी अभिमत दिशा को जा रहा हूँ। (दिशा का ˆअभिमत“ जो विशेषण है, व…
  7. Verse 7यह कहकर भगवान काल जैसे सूर्य सन्तप्त अंगवाले आकाश और पृथ्वी की उपेक्षा कर अपनी किरणों के…
  8. Verses 8–9उस भगवान कृतान्त के चले जाने पर भृगुपुत्र शुक्राचार्य ने अवश्यभाविनी कर्मगति तथा अनिवार्य…
  9. Verse 10वासुदेव नामवाली समंगातटवर्ती तपस्वी ब्राह्मण की देह , जिसका मुख तथा सम्पूर्ण अंग विकृत वर…
  10. Verse 11उस पुत्र के शरीर में जीव के प्रवेश कर लेने पर महामुनि श्री भृगु ने कमण्डलु के जल के साथ म…
  11. Verse 12अभिषेक के अनन्तर उस शरीर की सम्पूर्ण नाड़ियाँ ऐसे दीप्त हो उठी जैसे वर्षा ऋतु में जल प्रव…
  12. Verse 13जब वह शरीर वर्षा ऋतु मे कुमुदिनी की भति तथा वसन्त ऋतु में अभिनव लता की भाँति पूर्ण हो गया…
  13. Verse 14तदनन्तर शुक्राचार्य जल तथा वायु के संयोग से सर्वतः पूर्ण मेघ के तुल्य प्राणवायु के संचार…
  14. Verse 15सामने उपस्थित पवित्रमूर्ति पिता का नामगोत्रोच्चारणपूर्वक ऐसे अभिवादन किया जैसे मानों नूतन…
  15. Verse 16तदनन्तर स्नेह से आद्र चित्तवाले पिता ने (भृगुजी ने) पुत्र शरीर की यौवन सौन्दर्य आदिसे युक…
  16. Verse 17पहले की भोति यौवन, सौन्दर्य आदिसे युक्त वह नूतन पुत्र की देह स्नेह पूर्वक महामति भृगुजी न…
  17. Verse 18उस समय यह मेरा पुत्र है, इस स्नेह ने परमज्ञानी भृगुजी का भी आकर्षण कर लिया । देह में अत्य…
  18. Verse 19तदनन्तर वे दोनों पिता-पुत्र रात्रि के अन्त मे प्रसन्न हुए सूर्य ओर कमल समूह की भाँति परस्…
  19. Verses 20–22चिरकाल के बाद हुए संगम से सम्बद्ध (मिले हुए) चकवी-चकवा के जोड़े के तुल्य तथा वर्षा ऋतु के…
  20. Verse 23इस तरह उस पवित्र वन में वे दोनों तपस्वी भृगु तथा भृगुपुत्र शुक्राचार्य आकाश में चन्द्रमा…
  21. Verse 24तदनन्तर जगत के गुरु वे दोनों जीवन्मुक्त होकर भ्रमण करने लगे। उन्होने विज्ञेय आत्मतत्त्व क…
  22. Verse 25तदनन्तर समय आने पर शुक्राचार्यजी ने दैत्यों का आचार्यत्व तथा ग्रहपति का अधिकार प्राप्त कि…
  23. Verse 26पूर्वोक्त शुक्राचार्य की स्थिति का संक्षेप से उपसंहार करते हैं। यह उदार कीर्तिवाले शुक्रा…