Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 16, Verses 20–22
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 16, verses 20–22 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
स्थिति प्रकरण · सर्ग 16 · श्लोक 20-22
संस्कृत श्लोक
चिरसंगमसंबद्धाविव चक्राह्वदम्पती ।
घनागमनसस्नेहौ मयूरजलदाविव ॥ २० ॥
चिरकालदृढोत्कण्ठौ तुल्ययोग्यतया तया ।
स्थित्वा तत्र मुहूर्तं तावथोत्थाय महामती ॥ २१ ॥
समङ्गाद्विजदेहं तं भस्मसात्तत्र चक्रतुः ।
को हि नाम जगज्जातमाचारं नानुतिष्ठति ॥ २२ ॥
हिन्दी अर्थ
चिरकाल के बाद हुए संगम से सम्बद्ध (मिले हुए) चकवी-चकवा के जोड़े के तुल्य तथा वर्षा ऋतु के
समागम से स्नेह युक्त मयूर और मेघ के तुल्य उन दोनों महामुनियों ने चिरकाल के वियोग से, जिनकी
समागम की उत्कण्ठा दृढ़ हो गई थी, पूर्वोक्त वर्णन के अनुसार उस समान आनन्द की योग्यता से वहाँ
क्षण भर जड़ की नाई स्थिर होकर तदनन्तर उस समंगातटवर्तीं ब्राह्मण की देह का वहाँ दाह किया ।
कौन ऐसा व्यक्ति है, जो संसार के सदाचार का अनुविधान नहीं करता है ? आचार का पालन मात्र ही
यहाँ देहादि कृत्योँ का फल है, इतर फल नहीं हे, यह भाव हे