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Utpatti Prakarana (Creation) · Sarga 47

छियालीसवाँ सर्ग समाप्त सैंतालीसवाँ सर्ग सिन्धुदेश के राजा का शत्रुपर विजय पाने में हेतुकथन, सूर्योदय और रण का क्रम वर्णन तथा दोनों राजाओं का विविध मन्त्रास्त्रों द्वारा युद्ध वर्णन ।

16 verse-groups

  1. Verse 1श्रीवसिष्ठजी ने कहा : भद्र श्रीरामचन्द्रजी, जब कि उक्त भीषण समर-संगम हो रहा था, दोनों लील…
  2. Verse 2हे देवि, आपके सन्तुष्ट होने पर भी हमारे पति इस रणभूमि में, जिसमें से हाथी भाग रहे हैं, अक…
  3. Verses 3–4श्रीसरस्वतीजी ने कहा : पुत्रियों, राजा विदूरथ के शत्रु इस राजा सिन्धु ने विजय के लिए चिरक…
  4. Verse 5उक्त अर्थ को ही स्पष्ट करती हैं। जो मुझे जैसे प्रेरित करता है, उसके लिए में तत्फलस्वरूप ह…
  5. Verse 6“भें मुक्त ही होऊ" इस बुद्धि से मेरी, जो कि प्रतिभारूपिणी है, आराधना की है, इसलिए वह मुक्…
  6. Verse 7बाले से अप्रबुद्ध लीला को सम्बोधन किया गया है । प्रबुद्ध लीला को बाले“ से सम्बोधन सम्भव न…
  7. Verses 8–9हे बाले, इसलिए राजा विदूरथ उस देह को पाकर तुम्हारे ओर इस भार्या के साथ समय आने पर मुक्त ह…
  8. Verse 10श्रीवसिष्ठजी ने कहा : वत्स श्रीरामचन्द्रजी, दो देवियाँ यों कह रही थी कि जूझ रही दो सेनाओं…
  9. Verse 11जिन तिमिर संघातो ने (अन्धकार समुदायों ने) रात्रि में (सन्ध्या में) तारों की भाँति राक्षस,…
  10. Verse 12नीला आकाश और पर्वतश्रेणियाँ धीरे-धीरे प्रकट होने लगी । सम्पूर्ण भुवन काजल के सागर में से…
  11. Verse 13रणभूमि मेँ श्रष्ठवीरों पर रुधिर छटा की नाई शैलों पर सुवर्ण के द्रव समान सूर्य किरणें गिरी
  12. Verses 14–22तदुपरान्त आकाश ओर रणभूमि दोनों आकाश में उडी हुई ओर भूमि पर गिरी हुई वीरो की भुजाओं से ऐसे…
  13. Verses 23–29इस प्रकार आकाश और रणभूमि का वर्णन कर सिन्धु ओर विदूरथ का द्वैरथ (जिसमें केवल दो ही रथ हैं…
  14. Verses 30–32रणभूमि के कुण्डल के समान अलंकाररूप रथों के परिवर्तनरूप मण्डल में एक क्षणभर आवृत्ति कर युद…
  15. Verses 33–34उन बाणो में से कुछ के मुँह तलवार के सदुश थे, कुछ के मुंह मुद्गरके सदुश थे, कुछ के मुँह चक…
  16. Verse 35उस समय प्रलयकालीन वायु से गिराये गये पत्थरों के समूहों की नाई बाण उन पर गिरते थे । सिन्धु…