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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 47, Verses 14–22

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 47, verses 14–22 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 47 · श्लोक 14-22

संस्कृत श्लोक

शैलेषु वरवीरेषु रणे रक्तच्छटा इव । अदृश्यत ततो व्योम तथा रणमहीतलम् ॥ १४ ॥ बाहुभिर्भ्रान्तभुजगं प्रभाभिः कीर्णकाञ्चनम् । कुण्डलैः कीर्णरत्नौघं शिरोभिर्दृष्टपङ्कजम् ॥ १५ ॥ आयुधैः खड्गनीरन्ध्रं शरैः शलभनिर्भरम् । रक्ताभास्थिरसंध्याढ्यं ससिद्धपुरुषं शवैः ॥ १६ ॥ हारैः ससर्पनिर्मोकं कटैरिद्धं सुसंकुलम् । लसल्लतं पताकाभिरुरुभिः कृततोरणम् ॥ १७ ॥ हस्तैः पादैः पल्लवितं शरैः शरवणोपमम् । शस्त्रांशुशाद्वलश्यामं शस्त्रपूरैः सकैतकम् ॥ १८ ॥ कीर्णमायुधमालाभिरुन्मत्तमिव भैरवम् । फुल्लाशोकवनाकारं शस्त्रसंघट्टवह्निभिः ॥ १९ ॥ उदघुंघुमहाशब्दैर्विद्रवत्सिद्धनायकैः । सौवर्णनगराकारं बालार्ककचितायुधैः ॥ २० ॥ प्रासासिशक्तिचक्रर्ष्टिमुद्गरारणिताम्बरम् । वहद्रक्तनदीरंहः प्रोह्यमानशवोत्करम् ॥ २१ ॥ भुशुण्डीशक्तिकुन्तासिशूलपाषाणसंकुलम् । शूलशस्त्राहतिच्छन्नकबन्धपतनान्वितम् ॥ २२ ॥

हिन्दी अर्थ

तदुपरान्त आकाश ओर रणभूमि दोनों आकाश में उडी हुई ओर भूमि पर गिरी हुई वीरो की भुजाओं से ऐसे प्रतीत होते थे, मानों उनमें सर्प घूम रहे हैं, परस्पर प्रभा से दोनों ऐसे प्रतीत होते थे कि मानों उनमें सोना बिखेरा हे, आकाश में उड़ रहे और भूमि पर गिरे हुए कुण्डलो से आकाश और धरती तक ऐसा मालूम पडता था मानों उनमें रत्नराशियाँ विखेरी हों, सिरो से कमलपूर्ण तालाब- से प्रतीत होते थे, हथियारों से मानों गेडों से निविडरूप से भरे से मालम्‌ होते थे, बाणो से ऐसे लगते थे कि मानों वे टिड्डियों के दल से व्याप्त हों, रक्तकान्ति से वे स्थिरसन्ध्या से युक्त से मालूम होते थे, शवों से सिद्ध पुरुषों से पूर्णं हारों से सपि की केंचुल से भरे से, कवचो से प्रदीप्त ओर संकटग्रस्त से प्रतीत होते थे । आकाश में उड रही ओर भूमि में गिरी हुई पताकाओं से मानों उनमें लताएँ लहलहा रही हों, जंघाओं से मानों उनमें वन्दनवार बनाये गये हों, हाथ और पैरों से वे पल्लवयुक्त से प्रतीत होते थे, बाणों से शर के वन के सदश लगते थे, शस्त्रों की किरणों से हरी दूब से हरे भरे मैदान से प्रतीत होते थे, शस्त्रों के समूहोंसे केतकी के फूलों से युक्त से प्रतीत होते थे, हथियारों के समूहों से व्याप्त वे उन्मत्त भैरव से प्रतीत होते थे, शस्त्रास्त्रों के टकराने से उत्पन्न हुई अग्नि से प्रफुल्ल अशोक के वन के तुल्य प्रतीत होते थे, समुद्र की नाई 'घुं घुं' महाशब्दवाले, प्रातःकाल के सूर्य से प्रतीत आयुधवाले भाग रहे सिद्ध नायकों से सौवर्ण नगराकार प्रतीत होते थे, प्रास, तलवार, शक्ति, चक्र, ऋष्टि ओर मुद्गरों के उत्पतन ओर निपतन से आकाश प्रतिध्वनित हो रहा था, बह रही रुधिर नदी के प्रवाह से शवों के झुण्ड के झुण्ड बहाये जा रहे थे, भुशुण्डी, शक्ति, कुन्त, तलवार, शूल तथा पत्थरों के उत्पतन ओर निपतन से आकाश और रणभूमि पट गई थी, शूल ओर अन्यान्य शरत्रारत्रों के आघात से आच्छन्न कबन्ध वहाँ पर गिर रहे थे और काल के सदृश कराल ताण्डव करनेवाले वेताल हल-गल शब्द कर रहे थे