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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 47, Verses 23–29

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 47, verses 23–29 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 47 · श्लोक 23-29

संस्कृत श्लोक

कालताण्डववेतालकुलारब्धहलारवम् । शून्ये रणाङ्गणे दीप्तौ पद्मसिन्ध्वो रथौ चलौ ॥ २३ ॥ अदृश्येतां नभश्चिह्नौ चन्द्रसूर्यौ दिवीव तौ । चक्रशूलभुशुण्ड्यृष्टिप्रासायुधसमाकुला ॥ २४ ॥ सहस्रेण सहस्रेण वीराणां परिवारितौ । विचरन्तौ यथाकामं मण्डलैर्विततारवैः ॥ २५ ॥ सचीत्कारमहाचक्रपिष्टानेकमृतामृतौ । तरन्तौ रक्तसरितौ मत्तवारणलीलया ॥ २६ ॥ केशशैवलसंपन्ने चक्रचक्रजलेन्दुके । वहच्चक्राहतिक्षोभपातिताकुलवारणौ ॥ २७ ॥ मणिमुक्ताझणत्काररणत्कूबरकारवौ । वाताहतपताकाग्रपटत्पटपटारवौ ॥ २८ ॥ अनुयातौ महावीरैर्भूरिमिर्भीरुसैनिकैः । धारा वमद्भिः कुन्तानां शराणां धनुषामपि ॥ २९ ॥

हिन्दी अर्थ

इस प्रकार आकाश और रणभूमि का वर्णन कर सिन्धु ओर विदूरथ का द्वैरथ (जिसमें केवल दो ही रथ हैं) युद्ध का वर्णन करते हैं। परस्पर के युद्ध से अपने-अपने योद्धाओं का विनाश हो जाने से शून्य रणभूमि में जैसे स्वर्ग में आकाश के चिह्नभूत सूर्य और चन्द्रमा दिखाई दें, वैसे ही राजा विदूरथ और राजा सिन्धु के प्रदीप्त ओर चंचल दो रथ दिखाई दिये । वे दोनों रथ चक्र, शूल, भुशुण्डी, ऋष्टि, प्रास ओर अन्यान्य हथियारों से खचाखच भरे थे और उनमें प्रत्येक में एक-एक हजार वीर सवार थे। विस्तृत शब्दवाले अपने-अपने पैतरों से अपनी इच्छानुसार घूमते थे, उनके चीत्कार युक्त महान्‌ पहिये से अनेक मृत ओर घायल सैनिक चूर-चूर किये गये थे, मदोन्मत्त हाथी की चाल से वे रुधिरनदियों को, जो केशरूपी सेवाल से पूर्ण थी, रथों के चक्र ही जिनमें चक्रवाक ओर जल में प्रतिबिम्बित चन्द्र थे, तैरते थे, उन्होने चल रहे पहियों के आघात से हुई व्यथावश घायल हाथियों को गिरा डाला था, उनमें मणि और मोतियों के नकार ही रण में प्रवृत्त कूबरों के (रथ के अग्र भाग के) शब्द हो रहे थे, वायु के आघात से फरफरा रही पताका के अग्रभागमें पट-पट शब्द हो रहे थे, जिन वीरो के सैनिक कातर थे ऐसे अनेक महावीर उनके पीछे चल रहे थे, वे रणभूमिमें चल रहे भाले, बाणो, धनुषो, शक्तियों, प्रासो, कीलो ओर चक्रों की धाराओं को उगल रहे यानी वृष्टि कर रहे थे