Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 47, Verses 30–32
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 47, verses 30–32 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 47 · श्लोक 30-32
संस्कृत श्लोक
शक्तीनां प्रासशङ्कूनां चक्राणां कचतां रणे ।
तत्र तौ क्षणमावृत्ये मण्डले भूमिकुण्डले ॥ ३० ॥
उभौ व्यतिबभूवाते संमुखावायुधावुभौ ।
नाराचधारानिकरविक्षेपकरकध्वनौ ॥ ३१ ॥
अन्योन्यमपि गर्जन्तौ मत्ताब्धिजलदाविव ।
तयोः प्रहरतोर्बाणा वसुधानरसिंहयोः ॥ ३२ ॥
हिन्दी अर्थ
रणभूमि के कुण्डल के समान अलंकाररूप
रथों के परिवर्तनरूप मण्डल में एक क्षणभर आवृत्ति कर युद्ध में वे दोनों संमुख परस्परकी
क्रिया के व्यत्यास से शोभित होते थे । बाणरूपी धारासमूह ओर प्रास रूपी ओलों के गिराने
ओर उनको सहने के लिए की गई ध्वनि होने पर दोनों ही परस्पर तरंगित सागर ओर मेघो की
नाई गज्ति थे । परस्पर आघात-प्रतिघात कर रहे उन दोनों भूमि के नरश्रेष्ठो के पत्थरके
मूसल के सदश बाण आकाश में फलते थे