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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 47, Verses 33–34

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 47, verses 33–34 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 47 · श्लोक 33,34

संस्कृत श्लोक

पाषाणमुसलाकारा व्योमविस्तारिणोऽभवन् । करवालमुखाः केचिन्मुद्गराननकाः परे ॥ ३३ ॥ शितचक्रमुखाः केचित्केचित्परशुवक्त्रकाः । केचिच्छक्तिमुखाः केचित्केचिच्छूलशिलामुखाः । त्रिशूलवदनाः केचित्स्थूला इव महाशिलाः ॥ ३४ ॥

हिन्दी अर्थ

उन बाणो में से कुछ के मुँह तलवार के सदुश थे, कुछ के मुंह मुद्गरके सदुश थे, कुछ के मुँह चक्रों के तुल्य थे, कुछ के मुँह कुल्हाडे के सदृश थे, कुछ के मुँह शूल ओर शिलाओं के सदृश थे, कुछ के मुख त्रिशूलाकार ओर कोई महाशिला के समान स्थूलाकार थे, वे सब बाण आकाश में फलते थे