Utpatti Prakarana (Creation) · Sarga 46
पैंतालीसवाँ सर्ग समाप्त छियालीसवाँ सर्ग राजा विदूरथ का विराट् सेना के साथ युद्ध के लिए प्रयाण ओर रणभूमि में प्रवेश पूर्वक युद्धारम्भ का वर्णन ।
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- Verse 1श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : मुनिवर, उस राजमहल के अन्दर जब वे तीन ललनाएँ इस प्रकार की बातचीत…
- Verses 2–6श्रीवसिष्ठजी ने कहा : वत्स श्रीरामजी, राजा विदूरथ अपने महल से निकला और जैसे चन्द्रमा तारा…
- Verses 7–9सम्पूर्ण पूनम के चन्द्र के समान चँवरों की कान्ति से युक्त थे और अपनी हिनहिनाहट से दिशाओं…
- Verse 10तदुपरान्त मदोन्मत्त हाथी रूपी मेघों के चिंघाड़ से बढ़ा चढ़ा हुआ और पर्वतों के शिखरोंमें ग…
- Verses 11–14उक्त ध्वनि मदोन्मत्तसैनिको द्वारा किये गये कोलाहल से, हथियारों को टकराने से प्रचुरमात्रा…
- Verse 15हे श्रीरामचन्द्रजी, तदनन्तर अतिस्थूल बन कर आदित्य के मार्ग को ढोकने की इच्छा करनेवाला भूम…
- Verse 16उक्त धूलिपटल से वह महान् नगर मानों गर्भवास को प्राप्त हुआ रजोगुण की अधिक मात्रावाले यौवन…
- Verses 17–18जैसे दिवस के आविभवि से दीपों की कान्ति नष्ट हो जाती हे, वैसे की तारागण कहीं विलीन हो गये,…
- Verse 19जैसे एकमात्र समुद्र के जलप्रवाहों से बड़वानल शान्त हो जाता हे वैसे ही राजा विदूरथ के प्रय…
- Verse 20अपनी सेना को श्रुवाहिनी के साथ भिड़ाने के लिए ले जा रहे राजा विदूरथको अपनी सेना ओर शत्रु…
- Verse 21राजा विदूरथ के परबल में प्रविष्ट होने के उपरान्त "चट "चट “ शब्द के साथ साफ सुनाई दे रही प…
- Verses 22–26अनेक शत््रास्त्ररूपी पक्षीगण आकाश का आश्रय कर यानी आकाशमें उड़कर इधर-उधर घूमने लगे । जिन्…
- Verses 27–28हाथियों के दाँतों के परस्पर टकराने से उत्पन्न हुए टंकार बड़ी तेजी से ऊपर को गये, आकाश में…
- Verse 29खून के पनालों से धूल के कण शान्त हो गये और हाथियों के टकराने से उत्पन्न अग्नि से अन्धकार…
- Verse 30शब्दशून्य, भ्रमरहित अतएव वायु आदि से आकुलतारहित मेघ के समान केवल युद्ध हुआ, तलवाररूपी लहर…
- Verse 31उसमें खट-खट शब्द के साथ बाणवृष्टि बह रही थी, टक टक शब्द के साथ भुशूण्डियाँ गिर रही थी, झण…