Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 46, Verses 22–26
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 46, verses 22–26 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 46 · श्लोक 22-26
संस्कृत श्लोक
ययुरम्बरमाश्रित्य नानाहेतिविहंगमाः ।
प्रसस्रुरलमात्तासुमलिनाः शस्त्रदीप्तयः ॥ २२ ॥
जज्वलुः शस्त्रसंघट्टज्वलना उल्मुकाग्निवत् ।
जगर्जुः शरधारौघान्वर्षन्तो वीरवारिदाः ॥ २३ ॥
विविशुः क्रकचक्रूरा वीराङ्गेषु च हेतयः ।
पेतुः पटपटारावं हेतिनिष्पिष्टयोऽम्बरे ॥ २४ ॥
जग्मुः शमं तमांस्याशु शस्त्रकानलदीपकैः ।
बभूवुरखिला सेना नवनाराचरोमशाः ॥ २५ ॥
उत्तस्थुर्यमयात्रायां कबन्धनटपङ्क्तयः ।
जगुरुच्चै रणोद्रेकं पिशाच्यो रणदारिकाः ॥ २६ ॥
हिन्दी अर्थ
अनेक शत््रास्त्ररूपी पक्षीगण आकाश का आश्रय कर यानी आकाशमें
उड़कर इधर-उधर घूमने लगे । जिन्होंने शत्रुओं के प्राण ले लिये थे, अतएव पाप से मानों
जो मलिन हो गई थी, ऐसी शरत्रों की चमचमाहट इधर-उधर फैलने लगी । शस्त्रो के परस्पर
टकराने से उत्पन्न हुई आग अधजले काठ की नाई जलने लगी । बाणरूपी धारा-प्रवाहो की
वृष्टि कर रहे वीररूपी जलधर गजनि लगे | आरों के समान निष्टुर हथियार वीरो के अंग
प्रत्यंगों में घुसने लगे | तलवारों के प्रहार पट पट शब्द के रूप से आकाश में उड़े । शस्त्रास्त्रों
की अग्निरूपी दीपमालाओं से अन्धकार तुरन्त विनष्ट हो गया । सारी सेनाएँ नूतन बाण
रूपी रोंगटों से व्याप्त हो गई । यम की आराधनारूप यात्रोत्सव के लिए कबन्धरूपी नटों की
पंक्तियाँ उठने लगी । रणोत्सव की आभूषणरूप युवती पिशाचियाँ रण की भीषणता का खूब
ऊँचे स्वर में गान करने लगी