Guru's AddaGuru's Adda

Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 46, Verses 17–18

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 46, verses 17–18 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 46 · श्लोक 17,18

संस्कृत श्लोक

प्रययुः क्वापि दीपौघा दिवसेनेव तारकाः । आययुर्बलमालोला नैशभूतपरम्पराः ॥ १७ ॥ ददृशुस्तन्महायुद्धं द्वे लीले सा कुमारिका । प्रस्फुटद्धृदयेनेव देवीदत्तमहादृशौ ॥ १८ ॥

हिन्दी अर्थ

जैसे दिवस के आविभवि से दीपों की कान्ति नष्ट हो जाती हे, वैसे की तारागण कहीं विलीन हो गये, रात्रि में होनेवाले चंचल भूत - पिशाचो की कतार ने बल पकड़ा | उस महायुद्ध को दो लीलाओं ने तथा राजा विदूरथ की कन्या ने, जिन्हे देवी सरस्वती ने दिव्यदृष्टि दी थी, विदीर्ण हो रहे हृदय से बड़े क्लेश से देखा