Utpatti Prakarana (Creation) · Sarga 17
सोलहवाँ सर्ग समाप्त सत्रहवाँ सर्ग अन्वय ओर व्यतिरेक द्वारा नूतन वर्तमान ओर प्राक्तन पूर्वजन्म की सृष्ट्यां की, केवल मनोविलास होने से, तुल्यता का प्रतिपादन |
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- Verses 1–3सरस्वती ने कहा : वत्से, अपने पति के शव को फूलों के ढेर में छिपाकर रक्खो | ऐसा करने से फिर…
- Verse 4आकाशवाणी का उक्त वचन सुनकर जैसे जलके सूख जानेसे मुर्झा रही कमलिनीको नई वृष्टिका जल तसल्ली…
- Verses 5–8फूलों के ढेर में प्रच्छन्न अपने पति के शव को अन्तःपुर में ही रखकर कुछ धैर्य को प्राप्त हु…
- Verse 9लीला ने कहा : देवी, मेरे पति कहाँ हैं, क्या करते हैं और केसे हैं, यानी सुखी हैं या दुःखी…
- Verse 10इस लोक की कल्पना के समान परलोक की कल्पना का भी अधिष्ठान केवल चित् ही है, यह दिखलाने के ल…
- Verse 11उक्त चिदाकाश ही अपना आवरण करनेवाले अज्ञान से संकलित होकर जव प्रतीत होता है, तब वही मिथ्या…
- Verse 12देवी उसके लिए चिदाकाशका परिचय कराती है। हे सुभगे, संवित् के एक पलक में एक देश से दूसरे द…
- Verse 13अतः तुम्हारी चिदाकाश की प्राप्ति ही चिदाकाशरूप से स्थित पति के समीप में गमन है, क्योकी उस…
- Verse 14उसकी प्राप्ति कैसे होती है ? ऐसी आशंका होने पर उसकी प्राप्तिका उपाय बतलाती हैं । हे सुन्द…
- Verses 15–21श्री वसिष्टजी ने कहा : वत्स श्रीरामचन्द्रजी, ऐसा कह कर सरस्वती देवी अपने दिव्य लोक को चली…
- Verses 22–25सब देश के राजा उसके अधीन थे, यह दशति हैं। कर्णाटक देशाधिपति ने उसके पूर्वदेश की व्यवहारमर…
- Verses 26–31कतार लगाकर खड़े हुए असंख्य राजा ओंकी कान्तिसे उसका सारा आँगन जगमगा रहा था, उसकी यज्ञशाला…
- Verses 32–36वहाँ वह सबके आगे घूमती थी, परन्तु वहाँ पर स्थित पुरूषों ने अपने आगे घूम रही केवल संकल्पसे…
- Verses 37–57सकती हूँ अन्यथा मेरा मरण ही जानिये । रानी के यों कहने पर वह सारा-का-सारा राजपरिवार जाग उठ…