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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 17, Verses 37–57

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 17, verses 37–57 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 17 · श्लोक 37-57

संस्कृत श्लोक

अथान्यानप्यपूर्वांश्च पण्डितान्सुहृदस्तथा । व्यवहारांस्तथान्यांश्च पौरानन्यांस्तथैव च ॥ ३७ ॥ मध्याह्नकाले दिवसे घनदावाकुला दिशः । अन्तरिक्षं सचन्द्रार्कं साम्भोदपवनध्वनि ॥ ३८ ॥ महीरुहनदीशैलपुरपत्तनमण्डितम् । नानानगरविन्यास जङ्गलग्रामसंकुलम् ॥ ३९ ॥ द्विरष्टवर्षं भूपालं प्राक्तन्या जरसोज्झितम् । प्राक्तनीं जनतां सर्वां समस्तान्ग्रामवासिनः ॥ ४० ॥ सा तानालोक्य ललना चिन्तापरवशाभवत् । तस्मिन्नगरवास्तव्याः किं ते सर्वे मृता इति ॥ ४१ ॥ पुनः प्रज्ञप्तिबोधेन प्राक्तनान्तःपुरं गता । क्षणेन च ददर्शात्र सार्धरात्रे तथैव तान् ॥ ४२ ॥ अथ सोत्थापयामास निद्राक्रान्तं सखीजनम् । आह चातीव मे दुःखमास्थानं दीयतामिति ॥ ४३ ॥ भर्तुः सिंहासनस्यास्य पार्श्वे तिष्ठाम्यहं यदि । पश्यामि स्वभ्यसंघातं तत्प्रजीवामि नान्यथा ॥ ४४ ॥ स राजपरिवारोऽथ तयेत्युक्ते यथाक्रमम् । आसीद्विनिद्रः संव्यग्रः सर्वः सर्वस्वकर्मणि ॥ ४५ ॥ पौरान्सभ्यात्समानेतुं ययुर्याष्टीकपङ्क्तयः । व्यवहारं कलयितुमुर्व्यामर्ककरा इव ॥ ४६ ॥ आस्थानभूमिं भृत्याश्च मार्जयामासुरादृताः । प्रावृट्पयोदमलिन खं शरद्वासरा इव ॥ ४७ ॥ अङ्गणं प्रति दीपौघास्तस्थुः पीततमोम्भसः । आश्चर्यदर्शनायेव संप्राप्ता ऋक्षपङ्क्तयः ॥ ४८ ॥ जनताः पूरयामासुः पूरैरजिरभूमिकाः । अब्धीन्प्रलयसंशुष्कान्पुरासर्ग इवाम्भसा ॥ ४९ ॥ आजग्मुर्मन्त्रिसामन्ताः स्वंस्वं स्थानमनिन्दिताः । त्रैलोक्ये पुनरुत्पन्ने लोकपाला यथा दिशः ॥ ५० ॥ ववुराकीर्णकर्पूरसान्द्रावश्यायशीतलाः । उत्फुल्लकुसुमोद्वान्तमांसलामोदितानिलाः ॥ ५१ ॥ पर्यन्तेषु प्रतीहारास्तस्थुर्धवलवाससः । ऋष्यमूकार्कतापार्तमेघमाला इवाद्रिषु ॥ ५२ ॥ प्रभापीततमः पुञ्जाः पेतुः पुष्पोत्करा भुवि । चण्डमारुतविध्वस्तास्तारकानिकरा इव ॥ ५३ ॥ आस्थानं पूरयामासुर्महीपालानुयायिनः । उत्फुल्लकमलोत्कीर्णं हंसा इव सरोवरम् ॥ ५४ ॥ सिंहासनसमीपस्थे हैमचित्रासने नवे । उपाविशदसौ लीला लीलेव स्मरचेतसि ॥ ५५ ॥ ददर्श तान्नृपान्सर्वान्पूर्वानेव यथास्थितान् । गुरूनार्यान्सखीन्सभ्यान्सुहृत्संबन्धिबान्धवान् ॥ ५६ ॥ सकलमेव हि पूर्ववदेव सा समवलोक्य मुदं परमां ययौ । नृपतिराष्ट्रजनं खलु जीवनाभ्युदितया च बभौ शशिवच्छ्रिया ॥ ५७ ॥

हिन्दी अर्थ

सकती हूँ अन्यथा मेरा मरण ही जानिये । रानी के यों कहने पर वह सारा-का-सारा राजपरिवार जाग उठा ओर यथायोग्य अपने अपने काममें जुट गया। जैसे सूर्य की किरणे लोगो को अपने- अपने व्यवहार में लगाने के लिए पृथिवी पर आती हैं, वैसे पहरेदार नगरवासी सदस्यों को लेने के लिए गये । जैसे शरत्‌ ऋतु के दिन वर्षाकाल के बादलों से मलिन आकाश को स्वच्छ कर देते हैं, वैसे ही अपने कार्य में दक्ष सेवको ने सभामण्डप को खूब साफ-सुथरा कर दिया । आश्चर्य देखने के लिए आये हुए तारागणों के समान अन्धकाररूपी जलको पी चुकी दीपपंक्तियाँ आँगन मेँ जगमगा उठी । जैसे प्रलयकाल में सूखे हुए समुद्रो को जीवों की सृष्टि से पहले होनेवाली जल वृष्टि प्रवाह से पूर्ण कर देती हे, वैसे ही जनता ने राजा के आँगन को प्रवाह के समान आ रहे अपने संघ से भर दिया । जैसे प्रलय के अनन्तर त्रैलोक्य के पुनः उत्पन्न होने पर लोकपाल अपनी-अपनी दिशाओं में अधिष्ठित हो जाते हैं, वैसे ही निर्दोष मन्त्री ओर सामन्तगण अपने-अपने स्थान पर आ टे । चारों ओर बिखेरे हुए कपूर के समान निविड तुषार के संसर्ग से शीतल और खूब खिले हुए फूलोंसे निकल रहे मकरन्द की सुगन्ध से सुगन्धित वायु बहने लगी | जैसे ऋष्यमूक पर्वत पर अपने पुत्र सुग्रीव के ऊपर अनुग्रह करने लिए आये हुए सूर्य के सन्ताप से पीडित मेघपंक्तियाँ हिमालय आदि पर्वतं में आश्रय लेती हैं, वैसे ही सफेद वस्त्र पहने हुए प्रतीहार (द्वारपाल) सभामण्डप के प्रान्तो में (ओर छोर में) ये खड़े हो गये । जैसे प्रलयकाल के प्रचण्ड वायु से विध्वस्त होकर तारागण गिरते हैं, वैसे ही अपनी कान्ति से अन्धकारपटल का विनाश करनेवाले फूल तेज वायु के झोंकों से पृथिवी पर गिरने लगे। जैसे हंस प्रफुल्ल कमलों से व्याप्त सरोवर को भर देते हैं, वैसे ही महाराज के अनुयायियों ने सभामण्डप को ठसाठस भर दिया । जैसे कामदेव के चित्त में रति वैठती है या जैसे कामदेव से विकृत चित्त में श्रृंगारचेष्टाएँ आसन जमाती हैं, वैसे ही रानी लीला सिंहासन के पास में बिछाये हुए नूतन स्वर्णमय चित्रासन पर बैठ गई । लीला ने पहले की नाई यथायोग्य स्थानों में बैठे हुए, पहले के ही सब राजाओं, गुरुओं, माननीयो, मित्रों, सदस्यों, सहचरो, सम्बन्धियों ओर बन्धुवान्धवों को देखा । राजा के राष्ट्र के सभी लोगों को यथापूर्वं ही देखकर लीला की प्रसन्नता का ठिकाना न रहा ओर सबके जीवन का निश्चय होने से उदित हुई चन्द्रमा की-सी कान्ति से वह सुशोभित हो गई