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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 17, Verses 22–25

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 17, verses 22–25 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 17 · श्लोक 22-25

संस्कृत श्लोक

कर्णाटनाथरचितपूर्वदेशक्रियाक्रमम् । सुराष्ट्राधिपनिर्णीतसर्वम्लेच्छोत्तरापथम् ॥ २२ ॥ मालदेशसमाक्रान्तसर्वपाश्चात्यतङ्गणम् । दक्षिणाब्धितटायातलङ्कादूतविनोदितम् ॥ २३ ॥ पूर्वाब्धितटमाहेन्द्रसिद्धोक्तगगनापगम् । उत्तराब्धितटायातदूतवर्णितगुह्यकम् ॥ २४ ॥ पश्चिमाब्धितटालोकवर्णितास्तमद्यक्रमम् । असंख्यवद्धभूपालकलाकीर्णाखिलाजिरम् ॥ २५ ॥

हिन्दी अर्थ

सब देश के राजा उसके अधीन थे, यह दशति हैं। कर्णाटक देशाधिपति ने उसके पूर्वदेश की व्यवहारमर्यादा को अक्षुण्ण बना रक्खा था, सुराष्ट्र देशाधिपति ने उत्तरापथ में सम्पूर्ण म्लेच्छोंको उसके अधीन कर रक्खा था, मालंकाधिपतिने उसके लिए पश्चिम देशोंको आक्रन्त कर रक्खा था, दक्षिण समुद्रके तटसे आया हुआ लंका का दूत उसका मनोविनोद कर रहा था, पूर्वं सागर के तटवर्ती महेन्द्र पर्वत का सिद्ध उससे हजारों मुहानों के विस्तारसे आश्चर्यमयी गंगाजीका वर्णन कर रहा था, उत्तर सागर के तटसे आया हुआ दूत गुह्यको का वृत्तांत कह रहा था ओर जिस दूतने पश्चिम सागरका तट देखा था, वह अस्ताचलके रीति-रिवाजों को कह रहा था