Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 17, Verse 10
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 17, verse 10 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 17 · श्लोक 10
संस्कृत श्लोक
श्रीदेव्युवाच ।
चित्ताकाशं चिदाकाशमाकाशं च तृतीयकम् ।
द्वाभ्यां शून्यतरं विद्धि चिदाकाशं वरानने ॥ १० ॥
हिन्दी अर्थ
इस लोक की कल्पना के समान परलोक की कल्पना का भी अधिष्ठान केवल चित् ही है,
यह दिखलाने के लिए देवी सरस्वती चिदाकाशको चित्ताकाश ओर भूताकाशे परथकृकर
दिखलाती हे।
सरस्वतीजी ने कहा : सुन्दरी, एक वासनामय चित्ताकाश है, दूसरा शुद्ध चिदाकाश है
और तीसरा सुप्रसिद्ध व्यावहारिक भूताकाश हे । इन दोनों से सर्वथा शून्यको तुम चिदाकाश
जानो यानी इन दोनों की सन्धि में दो से शून्य चिदाकाश स्पष्टरूप से लक्षित होता है